सरहुल आज: गीत, नृत्य व उमंग का पर्व… प्रकृति व संस्कृति के संरक्षण का देता है संदेश

प्रकृति संरक्षण… सखुआ वृक्ष के फूल हैं जरूरी सरहुल में साल या सखुआ वृक्ष के फूल चढ़ाए जाते हैं। सदियों से इंसानी समाज के साथ सांस लेता यह वृक्ष सहजीवी संबंध का जीवंत उदाहरण है। यह न केवल जीवन देता है, बल्कि जीवन बचाता भी है। इसके पत्ते-दोने शुद्ध होते हैं। यह पर्व वृक्षों के संरक्षण का संदेश देता है। इस मौसम में महुआ, केंद, कटहल, आम, इमली फलों के आने से जंगल का महत्व पता चलता है। आस्था… घड़े का भरा पानी अच्छी बारिश का संकेत ‘सरहुल’ को ‘बा’, ‘बाहा पोरोब’, ‘जांकोर’, ‘खद्दी’ ‘खेखेल बेंजा’ कई नामों से पुकारा जाता है। अखरा में पूजा, घड़े में पानी देख वर्षा की भविष्यवाणी व दूसरे दिन फूलखोंसी तक आस्था के कई रूप देखने को मिलते हैं। पूजन कार्य के दौरान बलि अच्छी फसल, अच्छी वर्षा, गांव की सुरक्षा व सबके सुख-समृद्धि के लिए दी जाती है। उपवास और शुद्धता का विशेष महत्व है। उत्साह… हर उम्र के लोग एक लय-ताल में नृत्य करते हैं सरहुल झारखंड का सबसे बड़ा नृत्य उत्सव है। कहते हैं-सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग…यानी जहां चलना नृत्य व बोलना गीत-संगीत है। यही झारखंड का जीवन है। बसंत के मौसम में सरहुल को खुशियां का पैगाम माना जाता है। शोभायात्रा में बड़े-छोटे सभी एक लय और एक ताल में नृत्य कर एकता का संदेश देते हैं। आप पढ़ रहे हैं देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर 1 अखबार कुल पेज 14 | मूल्य ~4.00 | वर्ष 15, अंक 215 रांची, मंगलवार 1 अप्रैल, 2025 | चैत्र शुक्ल पक्ष- 3, 2082

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