सिंचाई सुविधा नहीं होने के बावजूद मेहनत के बल पर खेती कर आत्मनिर्भर बन रहे डुमरी के किसान

रोजगार और सिंचाई की व्यवस्था के अभावों के बीच प्रखंड के विभिन्न गांवों के किसान अपनी मेहनत और लगन के बल पर मिट्टी से अच्छी फसल उपजा रहे हैं और दूसरे के लिए प्रेरणा स्रोत बन रहे हैं। यदि सरकारी स्तर पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो जाए तो ये किसान क्षेत्र की तस्वीर और तकदीर बदल सकते हैं। डुमरी प्रखंड के नावाटांड़, टेसाफुली, जामतारा, पिण्ड्राबांध, बलथरिया, मटियो, तुइयो, ठाकुरचक आदि गांवों के किसान धान की फसल के बाद अपने तन- मन और धन से सिंचाई की व्यवस्था कर सब्जी, सरसो और गेंहू की खेती कर रहे हैं। इससे किसानों में खुशहाली आई है और कुछ हद तक पलायन भी रुका है। प्रखंड के नावाटांड़ गांव के लोगों ने वर्षों पूर्व बेरोजगारी और पलायन रूपी अभिशाप को कृषि रूपी हथियार से दूर करने का बीड़ा उठाया था। गांव में सिंचाई के साधन का अभाव के बाद भी अपनी इच्छाशक्ति के बल पर किसान गांव के तालाब और निजी कुंओं को सिंचाई का साधन बना कर खेती कर रहे हैं। एक समय ईख की खेती से प्रसिद्ध अब इस गांव में गेंहूं और सब्जी की खेती बड़े पैमाने पर हो रही है। यहां की जमीन पूरे वर्ष हरियाली की चादर ओढ़े रहती है। अब बुर्जुगों के साथ-साथ युवा भी खेती के काम में लगे रहते हैं। अतकी पंचायत का आदिवासी बहुल गांव पिंड्राबांध गांव के लोगो‍ं ने खेती को ही अपनी जीविका का प्रमुख साधन बना लिया है। पूरे वर्ष भर जीहतोड़ मेहनत कर खरीफ और रवि फसल के साथ-साथ सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। गांव में धान के अलावा मटर,बैगन, टमाटर, सरसो सहित अन्य सब्जियों का भी उत्पादन होता है। सिंचाई का साधन नहीं होने के कारण किसानों को खेती करने में भी परेशानी होती है। उन्हें भुईयां नाला के पानी से सिंचाई करना पड़ता है। आदिवासी गांव टेसाफुली में भी ग्रामीणों का खेती से गहरा लगाव है। यह गांव पारसनाथ पहाड़ की तलहटी में बसा हुआ है। यहां की भौगोलिक बनावट किसानों के लिए अनुकूल है। यह गांव चारों ओर से पर्वत और पहाड़ से घिरा होने के कारण इस गांव की भौगोलिक बनावट कटोरे की तरह है। इस कारण यहां जल स्तर काफी ऊपर है। जेठ की गर्मी में जहां प्रखंड के अन्य गांवों में खेती करना मुश्किल हो जाता है। वहीं इस गांव में जेठुआ सब्जी की भरपूर खेती होती है। नमी के कारण किसान धान की खेती देर से करते हैं, ताकि ज्यादा नमी की वजह से धान की फसल को नुकसान नहीं हो। वहीं जामतारा, कसमाकुरहा, तुइयो, बरमसिया भी ऐसे गांव हैं, जहां के किसान अपने बल पर खेती को जीविका का साधन बना रहे हैं। बताते चलें कि डुमरी प्रखंड में 17 हजार हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है और इस कृषि योग्य भूमि के लगभग 8 सौ हेक्टेयर भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा है।

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