झारखंड में करीब 15% ट्राइबल पॉपुलेशन में सिकल सेल नामक गंभीर बीमारी के जीन हैं। ट्राइबल आदिवासी के बीच पूर्व में हुई स्क्रीनिंग में ये आंकड़े सामने आए थे। इनमें 2 से 3% बच्चे सिकल सेल एनिमिया की चपेट में हैं। यह खून से संबंधित अनुवांशिक बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में आती है। यह धीमे जहर की तरह काम करती है। इस बीमारी के कारण 5 साल से कम उम्र के हर 100 में से 30 बच्चे की मौत हो जाती है। इस बीमारी को लेकर दैनिक भास्कर ने झारखंड के हेमेटोलॉजिस्ट (खून संबंधित बीमारी के विशेषज्ञ) डॉ. अभिषेक रंजन से बात की। उन्होंने बताया कि इस बीमारी के कारण शरीर का महत्वपूर्ण अंग स्प्लीन बार-बार सिक्लिंग (सिकुड़ने) के कारण डैमेज हो जाता है। इसलिए ऐसे बच्चों में कोई भी मामूली से मामूली बुखार तक जानलेवा हो सकता है। इसके कारण बच्चों में बोन, हार्ट, एक्यूट चेस्ट सिंड्रोम समेत तरह-तरह के कॉम्पलीकेशन हो सकते हैं। दैनिक भास्कर ने जब इस दवा की पड़ताल की तो पता चला कि मात्र 50 पैसे कीमत की यह जीवनरक्षक दवा न तो सरकारी सप्लाई में है और न ही अधिकांश निजी दवा दुकानों में उपलब्ध है। निजी दवा दुकानों में इसलिए दवा उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस दवा की बिक्री में बेहद कम मार्जिन है। वहीं, डॉ. अभिषेक बताते हैं कि यदि यह दवा सरकारी सप्लाई में उपलब्ध कराई जाए तो बीमारी से पीड़ित करीब 20-25% बच्चों की आयु वर्तमान की तुलना में 8 से 10 साल तक बढ़ सकती है। डॉ. अभिषेक रंजन ने बताया कि पेनिसिलिन नाम की दवा 6 माह से 5 साल तक के बच्चों को दी जाती है। सिकल सेल के कारण बच्चों में तरह-तरह के इंफेक्शन का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। यह एक मात्र दवा है जो इंफेक्शन की संभावना को न सिर्फ कम करती है, बल्कि संभावना खत्म भी करती है। इसलिए यह दवा जीवन रक्षक के तौर पर सिकल सेल पीड़ित रोगियों के लिए कारगर है। सदर अस्पताल में थैलेसिमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी बीमारी के लिए डे केयर संचालन होता है। अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, हर दिन सदर अस्पताल में 10 से 12 सिकल सेल पीड़ित बच्चे इलाज कराने पहुंचते हैं। जबकि पिछले एक साल में सिकल सेल के 2500 से ज्यादा पीड़ितों का उपचार किया गया है। इनमें करीब 70 से 75% बच्चे अस्पताल में नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराते हैं। डॉ. अभिषेक ने बताया कि सदर अस्पताल में कई बार ऐसे भी बच्चे पहुंचते हैं, जिन्हें मल्टीपल ट्रांसफ्यूज किया गया होता है। देखने को मिला है कि हीमोग्लोबिन 8 ग्राम, 7 ग्राम में भी ब्लड ट्रांसफ्यूजन कर दिया जाता है, जबकि सिकल सेल पीड़ित की हिमोग्लोबिन जबतक 6 ग्राम से कम न हो, उन्हें ब्लड ट्रांसफ्यूज नहीं करना चाहिए। इससे बच्चे की तबीयत और ज्यादा खराब होती है। गलत इलाज के कारण कई बार देखने को मिलता है कि मरीज की मौत समय से पहले हो जाती है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को मामूली बुखार भी हो तो इसे मेडिकल इमरजेंसी के रूप में लेना चाहिए। सामान्य बुखार होने पर 2-3 दिन के बाद एंटीबायोटिक लेते हैं। इसमें तुरंत लेना अनिवार्य है।


