सीहोर में 14 जनवरी 1858 को अंग्रेज अफसर जनरल ह्यूरोज के आदेश पर 356 क्रांतिकारियों को जेल से निकालकर सीवन नदी किनारे स्थित सैकड़ाखेड़ी चांदमारी मैदान में लाया गया। यहां सभी क्रांतिकारियों को एक साथ खड़ा कर गोलियों से छलनी कर दिया गया। यह घटना मध्य भारत के सबसे क्रूर हत्याकांडों में गिनी जाती है। मकर संक्रांति पर शहीदों को किया गया नमन मकर संक्रांति के अवसर पर मंगलवार को बड़ी संख्या में नागरिक, सामाजिक संगठनों और युवाओं ने सैकड़ाखेड़ी मार्ग पर स्थित शहीदों के समाधि स्थल पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित की और उन्हें श्रद्धांजलि दी। 1857 की क्रांति से पहले ही सीहोर में भड़क चुकी थी चिंगारी भारतीय इतिहास में 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, जिसकी शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई थी। लेकिन इससे पहले ही सीहोर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी सुलग चुकी थी। 13 जून 1857 को मेवाड़ और उत्तर भारत से चलकर क्रांतिकारी चपातियां सीहोर और आसपास के गांवों तक पहुंच गई थीं। कारतूस विवाद बना विद्रोह की बड़ी वजह 1 अगस्त 1857 को सीहोर छावनी के सैनिकों को नए कारतूस दिए गए, जिनमें गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात सामने आई। इससे सैनिकों में भारी आक्रोश फैल गया। आक्रोशित सैनिकों ने अंग्रेजों का झंडा उतारकर जला दिया और महावीर कोठ तथा वलीशाह के नेतृत्व में ‘स्वतंत्र सिपाही बहादुर सरकार’ का गठन किया। जनरल ह्यूरोज का क्रूर आदेश सीहोर में बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी मिलते ही जनरल ह्यूरोज ने विद्रोह को बलपूर्वक कुचलने के आदेश दिए। इसके बाद 356 क्रांतिकारियों को एक साथ मौत के घाट उतार दिया गया। हत्याकांड के बाद जनरल ह्यूरोज ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए आदेश दिया कि शहीदों के शवों को पेड़ों पर लटका दिया जाए। दो दिनों तक शव पेड़ों पर लटके रहे। बाद में आसपास के ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए शवों को उतारकर उसी मैदान में दफनाया, जहां उन्हें गोली मारी गई थी। इतिहास में दर्ज सीहोर का बलिदान मध्य भारत में अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोहों में सीहोर की यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के समान अमानवीय मानी जाती है। आज भी सैकड़ाखेड़ी का मैदान उन 356 शहीदों की गवाही देता है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।


