भास्कर न्यूज | बालोद जिले के गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम कमरौद में चल रही श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ कथा के छठवें दिन कथा वाचक पंडित लोकेश शर्मा ने श्रीकृष्ण-सुदामा चरित्र का वर्णन किया। कथा सुनने पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु भावविभोर हो गए। सुदामा की दयनीय दशा, भगवान श्रीकृष्ण में उनकी अटूट निष्ठा और त्याग की कथा सुनकर कई श्रद्धालुओं की आंखें भर आईं। कथा स्थल पर महिलाओं ने अपने घरों से चावल की पोटली लाकर सुदामा को भेंट की। यह दृश्य देखकर पंडाल में मौजूद सभी श्रोता भावुक हो गए। पंडित शर्मा ने बताया कि सुदामा दरिद्र जरूर थे, लेकिन विद्वान थे। उनके पास धन कमाने की क्षमता थी, फिर भी उन्होंने आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म किया। उन्होंने पेट के लिए नहीं, आत्म कल्याण के लिए जीवन जिया। उन्होंने कहा कि सुदामा का द्वारिका आगमन पत्नी के कहने पर हुआ, लेकिन श्रीकृष्ण ने उनका सत्कार व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व के आधार पर किया। यह चित्त की नहीं, चरित्र की पूजा थी। कथा वाचक ने कहा कि सुदामा की निष्ठा और त्याग का सम्मान ही उनका असली धन था। मित्रता में कभी बदले की भावना नहीं होनी चाहिए। पत्नी के बार-बार कहने के बाद सुदामा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने जाते हंै। कृष्ण को देखकर दोस्त की भक्ति भावुक हो जाती है। अपने नेत्रों के जल से सुदामा के चरणों को धो देते हैं। मनुष्य को ऐसा ही आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए उन्होंने कहा कि आज मनुष्य को ऐसा ही आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता अब नहीं है। यही कारण है कि आज भी सच्ची मित्रता के लिए कृष्ण सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। सुदामा की आने की सूचना मिलते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने पहुंच गए। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। शर्मा ने भजनों के माध्यम से भगवान की करुणा और कृपा की लीलाओं का वर्णन किया। भजनामृत की फुहार में श्रोता झूम उठे। सुख-दुख भगवान को समर्पित कर दिए थे पंडित शर्मा ने कहा कि सुदामा संसार के सबसे अनोखे भक्त थे। वे जीवन में जितने गरीब दिखे, उतने ही मन से धनवान थे। उन्होंने अपने सुख-दुख भगवान को समर्पित कर दिए थे। जब वे श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे, तो भगवान ने उनके फटे कपड़े नहीं देखे, बल्कि उनकी भावना को पहचाना। मनुष्य को कभी अपना कर्म नहीं भूलना चाहिए। सच्चा मित्र वही होता है जो श्रीकृष्ण और सुदामा जैसा हो। जो हर परिस्थति में साथ खड़ा रहे।


