सुधा मूर्ति बोली- बच्चों का कम्पेरिजन नहीं करना चाहिए:कहा- जिंदगी 3 घंटे की फिल्म नहीं, पेरेंट्स बच्चों पर न बनाएं प्रेशर

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंची सुधा मूर्ति ने पेरेंट्स और बच्चों के रिलेशन के साथ ही अपनी फ्यूचर प्लांस को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि हमें अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने होंगे। उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा। अगर आप मां है, तो आपको अपने बच्चों की देखभाल कर उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाना चाहिए। अगर कोई मां ही फोन में बिजी रहेगी और बच्चे से कहेंगे कि तुम पढ़ो। बच्चा नहीं पढ़ेगा। अगर मैं अपने बच्चों से कुछ कहूंगी तो मुझे उसके लिए वैसा ही होना पड़ेगा। डिजिटल दौर में ऑनलाइन पढ़ने के सवाल पर जवाब देते हुए सुधा मूर्ति ने कहा- आज के दौर में पढ़ने का तरीका बदल गया है। मेरे पूर्वजों के वक्त लोग भोजपत्र से पढ़ते थे। उसके बाद पढ़ने की तकनीक में बदलाव हुआ। मेरे वक्त लोग स्लेट और पत्थर पर पढ़ते थे। इसके बाद कागज पर पढ़ने लगे हैं। लगातार ज्ञान हासिल करने का तरीका बदल रहा है। ज्ञान के प्रति प्रेम नहीं बदला है। मैं इतना ही कह सकती हूं कि आज के दौर में 100% डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करने से नहीं बच सकते हैं। अब यह संभव नहीं है। हालांकि इसे केवल सीमित किया जा सकता है। मैं खुद भी डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करती हूं। लिमिटेड इस्तेमाल करती हूं। मुझे अखबार पढ़ना होता है। मैं अखबार ही पड़ती हूं। डिजिटल न्यूजपेपर नहीं पढ़ती हूं। अगर मुझे किताब पढ़नी होती है। मैं किंडल का इस्तेमाल नहीं करती हूं। मैं किताब पढ़ती हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि ऑनलाइन पढ़ने से आपकी सोच का दायरा सीमित हो जाता है। एप्पल का फोन नहीं मिलने से बच्चे डिप्रेशन में चले जाते है सुधा मूर्ति ने कहा- माता-पिता बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को कहते हैं। खूब पढ़ो अच्छे नंबर लाओ, यह बहुत जरूरी है। इस बात से मैं भी इनकार नहीं करती हूं। हमें पढ़ने के साथ ही दूसरी बातें भी बच्चों को बतानी चाहिए। जो बात उनके सिलेबस में नहीं है। जो बात उन्हें शिक्षक नहीं बता सकता है। वह माता-पिता को बतानी चाहिए। उन्होंने कहा- आज के दौर में बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत करना बेहद जरूरी है। आज के दौर में अगर किसी बच्चे को एप्पल का फोन नहीं मिलता तो वह डिप्रेशन में चला जाता है। पिता उसे कभी घूमने नहीं जाने देते हैं। लड़की डिप्रेशन में चली जाती है। अगर पड़ोसी के बच्चे ने आपके बच्चे से बेहतर स्कोर हासिल किया है। मां डिप्रेशन में चली जाती है। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारा दिमाग कमजोर हो रहा है। हमें बच्चों को सिखाना होगा कि यह जिंदगी है 3 घंटे की फिल्म नहीं है। इंजीनियरिंग नहीं कर पाने से जीवन खत्म नहीं होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। कठिनाइयों सबके जीवन में आती है, उतार और चढ़ाव जीवन का एक हिस्सा है। जो आता है और जाता है। इसलिए हमें बच्चों को सीखाना चाहिए कि वह जहां है। उस स्थिति से कैसे निपटा जाए। क्योंकि कई बार माता-पिता की वजह से भी बच्चों का दिमाग कमजोर हो जाता है। सुधा मूर्ति ने कहा- हर बच्चा आईआईटी में नहीं जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि उनमें क्षमता नहीं है। आपके पास एक जीवन है। मान लीजिए कि आप इंजीनियरिंग नहीं कर पाए। आपका जीवन खत्म हो गया, ऐसा नहीं है। जीवन बहुत बड़ा है। कम्पेरिजन नहीं करना चाहिए उन्होंने कहा- पेरेंट्स को अपने बच्चों के साथ कम्पेरिजन नहीं करना चाहिए। अगर आपका बच्चा 97% मार्क्स लाया है। आपको खुशी मनानी चाहिए, न कि पड़ोसी के 98% मार्क्स लाने वाले बच्चों के साथ उसका कम्पेरिजन करना चाहिए। कम्पेरिजन दुख का सबसे बड़ा कारण है। अपने बच्चों ने अपने स्तर पर सर्वश्रेष्ठ किया है। 99% न हो 80% भी हो लेकिन ठीक है। 80% से भी जीवन में काफी संभावनाएं हैं। इसलिए मुझे लगता है, माता-पिता ऐसे होने चाहिए। जो अपने बच्चों को मजबूती दें। तनाव से उन्हें दूर रखें। हर बच्चा एक जैसा नहीं हो सकता है। सब की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं। इसलिए माता-पिता के साथ बच्चों को भी तनाव से निपटने की कला आनी चाहिए। उन्होंने कहा- आज सोशल मीडिया के दौर में सोचने की तरीके में बदलाव आ गया है। भगवान विष्णु को मेरे बच्चे महाभारत के नितीश भारद्वाज की तरह दिखते थे। अब मेरे पोते पोतियां उन्हें सौरभ की तरह देख रहे हैं। यह मीडिया और डिजिटल मीडिया की कल्पना है। मैं गांव में पैदा हुई। पढ़ी लिखी हूं, जहां मेरे लिए कमल नैनम विष्णु की कल्पना करना बहुत अलग था। पैरंट्स बच्चों पर बनाते है प्रेशर उन्होंने कहा- अगर किसी बच्चे की क्षमता 5 किलो वजन उठाने की है तो वह ज्यादा से ज्यादा 6 किलो वजन उठा सकता है। अगर आप 5 किलो क्षमता वाले बच्चों को 25 किलो वजन उठाने के लिए कहेंगे। वह डिप्रेशन में चला जाएगा। आजकल पेरेंट्स अपने बच्चों को आईआईटी इंजीनियर बनने के लिए मोटिवेट करते हैं। काफी बच्चे यह करने में सक्षम नहीं होते। उनके पेरेंट्स उन पर प्रेशर बनाते हैं। उन्हें बताते हैं कि हमने आपके लिए जमीन बेच दी। परेशान हालत में आपको पढ़ रहे हैं। इससे बच्चे और ज्यादा तनाव में आ जाते हैं। क्योंकि उनकी इंजीनियरिंग में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। इसलिए बच्चों को उनकी पसंद पर ही फ्यूचर बनाने की छूट दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं परफेक्ट नहीं हूं। इसलिए मैंने कभी दुनिया वालों से भी इस पर स्पष्टीकरण नहीं मांगा। क्योंकि मुझे पता है। मैं परफेक्ट नहींहूं।। उम्र के साथ लक्ष्य बदलते रहते है उन्होंने कहा- मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है। अगर मैं उसे हासिल कर लेती हूं। वह मेरे हिसाब से सफलता है। यह लक्ष्य उम्र बढ़ाने के साथ बदलता रहता है। जब आप कॉलेज में होते हो तो एक अच्छा पति हासिल करना सफलता है। आप जब शादीशुदा होते हैं तो आपके बच्चे होना एक सफलता है। जब आप मां होती हैं तो आप चाहते हैं कि बच्चे सफल हो। यह भी एक सफलता है। जब आप बूढ़े हो जाते हैं तो सोचते हैं कि मुझे डायबिटीज और बीपी न हो। इसमें भी एक सफलता है। क्योंकि यह आपको खुशी देती है। इसलिए मुझे लगता है कि जीवन में लक्ष्य बदलते रहते हैं। सुधा मूर्ति ने कहा कि मैं भारत से हूं और भारत में ही काम करती हूं। मैं अपने नाती-नाती की वजह से लंदन जाती हूं। उससे ज्यादा मेरा विदेश से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं। इसलिए मुझे उन्हें संभालने की जरूरत नहीं है। लेकिन मेरे बच्चे अब मुझे संभालते हैं। मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियां खत्म हो गई है। उन्होंने बताया कि अब मेरे पास जो भी वक्त होता है। उसमें मैं 4 महीने दिल्ली में और 8 महीने बेंगलुरु में बिताती हूं। इसी बीच कभी कभार में सफर भी करती हूं। मैं समय बर्बाद नहीं करती हूं, मैं पहले अपनी डायरी में लिख लेती हूं। जो मेरे लिए बहुत सुखद अनुभव है। उन्होंने कहा कि मैं आमतौर पर शादियों में बर्थडे पार्टी और अन्य कार्यक्रमों में शामिल नहीं होती हूं। मैं हर चीज को समय के हिसाब से महत्व देता हूं, और समय का सबसे ज्यादा ध्यान रखती हूं। यही कारण है कि मैं एक बेहतर प्रबंधन में सक्षम हूं। मूर्ति ने कहा कि आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन साहित्य से इसे नहीं जोड़ा जा सकता है। क्योंकि साहित्य दिल से जुड़ा हुआ सब्जेक्ट है। हालांकि यह राय मेरी है, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि भावनाएं तकनीक से बहुत ज्यादा अलग होती है। उदाहरण के तौर पर किसी को पीला रंग पसंद है। इसका कोई तर्क नहीं है। ऐसे में जब भावनाएं आती है। तो मुझे लगता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उसे जगह सटीक शायद ही साबित हो पाए। हालांकि जब एक बार आप अपनी कहानी तय कर लेते हैं। तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से टाइप करने से लेकर उसमें करेक्शन जैसे काम बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

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