रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति-कुलपति प्रो. डॉ. वेद प्रकाश शरण (80) का निधन गुरुवार को तड़के तीन बजे रांची के एक अस्पताल में हुआ। वे पिछले चार साल से किडनी की बीमारी से पीड़ित थे। डॉ. शरण ने सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में राजनीति विज्ञान विभाग के एचओडी और फैकल्टी के रूप में 37 साल तक छात्रों का मार्गदर्शन किया। आरयू के प्रति-कुलपति और कार्यकारी कुलपति भी बने, जहां उन्होंने एग्जाम सिस्टम को मजबूत करने में अहम योगदान दिया। डॉ. शरण वरिष्ठ पत्रकार भी थे। उन्होंने आरयू में पत्रकारिता विभाग के निदेशक और रांची प्रेस क्लब के संस्थापक संयुक्त सचिव के रूप में पत्रकारिता शिक्षा और मीडिया जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने रांची प्रेस क्लब का बायलॉज बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. शरण की पहल पर ही कम्युनिटी रेडियो की स्थापना हुई। उनका निधन शिक्षा और पत्रकारिता दोनों क्षेत्रों के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके योगदान और मूल्य छात्रों, सहकर्मियों और शिक्षा जगत में हमेशा याद रहेंगे। अंतिम संस्कार शुक्रवार को दोपहर में हरमू मुक्तिधाम में किया जाएगा। वे अपने पीछे एक पुत्री और दमाद को छोड़ गए हैं। इनके निधन पर वीसी प्रो. डीके सिंह, पूर्व वीसी डॉ एए खान, पूर्व वीसी डॉ. रमेश पांडेय, डॉ. ज्योति कुमार, सोशल साइंस डीन डॉ. परवेज हसन, विभावि के प्रॉक्टर डॉ. मिथिलेश, डॉ. ज्योति प्रकाश, प्रो. अशोक सिंह, डॉ. विनोद नारायण, डॉ. अमर चौधरी, डॉ. सुशील अंकन, आर्यभट्ट विवि के प्रमोद कुमार समेत अन्य ने गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है। मूल्यों के प्रशासक थे डॉ. वेद प्रकाश शरण रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति-कुलपति डॉ. वेद प्रकाश शरण का असामयिक निधन शिक्षा जगत के लिए बड़ी क्षति है। जब मैं रांची विश्वविद्यालय में कुलपति के दायित्व का निर्वहन कर रहा था, उस समय डॉ. शरण मेरे साथ प्रति-कुलपति के रूप में कार्यरत थे। इस निकट सहयोग के दौरान उन्हें न केवल एक सक्षम प्रशासक के रूप में, बल्कि एक संतुलित, मूल्यनिष्ठ और संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में जानने का अवसर मिला। डॉ. शरण प्रशासन को केवल फाइलों और आदेशों की प्रक्रिया नहीं मानते थे, बल्कि उसे संस्थान के भविष्य निर्माण का माध्यम मानते थे। परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता और अकादमिक अनुशासन को सुदृढ़ करने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि संस्थागत हित और नैतिकता के आधार पर निर्णय लेते थे। प्रति-कुलपति बनने से पहले वे सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने न केवल विद्यार्थियों को विषय ज्ञान दिया, बल्कि उन्हें सामाजिक उत्तरदायित्व, लोकतांत्रिक मूल्यों और बौद्धिक ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया। डॉ. शरण की सबसे बड़ी विशेषता उनका मानवीय दृष्टिकोण था। वे अधिकारों के साथ कर्तव्यों पर बल देते थे और अनुशासन के साथ संवेदना को जोड़कर देखते थे। उनके लिए समानता केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार थी। वे संवाद में विश्वास रखते थे और मतभेदों को भी गरिमा के साथ सुलझाने में सक्षम थे। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रशासक का जाना है जो मूल्यों को व्यवस्था से ऊपर रखता था।


