भोपाल एम्स में लंग्स और लिवर ट्रांसप्लांट जल्द शुरू हो सकता है। हाल में ऑर्गन डोनेशन को मंजूरी देने वाली कमेटी स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन की टीम ने दौरा कर तैयारियां देख ली हैं। टीम की रिपोर्ट मिलते ही ट्रांसप्लांट की औपचारिक शुरुआत हो सकती है। इस सुविधा के शुरू होने के बाद एम्स भोपाल सेंट्रल इंडिया का पहला सरकारी अस्पताल बन जाएगा, जहां हार्ट, किडनी, लिवर और लंग्स चारों तरह के बड़े ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक ही जगह किए जा सकेंगे। बता दें कि लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए एम्स ने अत्याधुनिक तकनीक और मशीनें तैयार रखी हैं। इनमें एक्मो (एक्स्ट्रा कॉर्पोरियल मेंब्रेन ऑक्सीजंशन), हार्ट-लंग्स मशीन और आईएबीपी (इंट्रा-ऑर्टिक बैलून पंप) शामिल हैं। केंद्र से अनुमति मिल जाती है, तो मप्र उन चुनिंदा राज्यों में शामिल होगा जहां लंग्स और लिवर दोनों के ट्रांसप्लांट सरकारी संस्थान में उपलब्ध होंगे। इससे पड़ोसी राज्यों के मरीजों को भी फायदा मिलेगा। भास्कर एक्सपर्ट – भारत में हर साल करीब 5 लाख लोग ऑर्गन फेलियर से मरते हैं। इनकी जान सिर्फ एक ऑर्गन से बच सकती है। लेकिन, अंगदान करने वालों की संख्या बेहद कम है। मध्यप्रदेश में स्थिंति और भी चिंताजनक है। ब्रेनडेड मरीज मिल भी जाए, तो ऑर्गन डोनेशन की प्रक्रिया बीच में ही अटक जाती है। फंड की कमी और परिजनों की अनिच्छा से लेकर अस्पष्ट गाइडलाइन तक इसमें बाधा है। ऑर्गन डोनेशन बढ़ाने के लिए कानून से लेकर अस्पतालों तक, और जनता से लेकर सरकार तक हर स्तर पर बदलाव की जरूरत है। इस समय मप्र में अंगदान में प्रमुख अड़चनें और उनके समाधान 1. फंड की कमी: ब्रेन डेड मरीज के वेंटिलेशन से लेकर ऑर्गन रिट्रीवल और ट्रांसप्लांट तक का खर्च लाखों में पहुंचता है। आयुष्मान योजना में यह खर्च कवर नहीं होता, इसलिए अस्पताल पीछे हट जाते हैं।
समाधान: आयुष्मान में ऑर्गन रिट्रीवल और डोनेशन प्रक्रिया को शामिल करें। राज्यों में इसका फंड बने।
2. परिजन नहीं मानते: कई मामलों में परिवार वाले ब्रेनडेड डिक्लेरेशन को मौत मानने को तैयार नहीं होते। वे सोचते हैं अंग निकालना जल्दबाजी है।
समाधान: हर बड़े अस्पताल में 24×7 ट्रेंड काउंसलर हों। अस्पतालों के भीतर ऑर्गन डोनेशन सपोर्ट सेल और कानूनी प्रक्रिया में सरलीकरण हो।
3. आमजन में मिथक: लोगों में गलतफहमी है कि ऑर्गन डोनेशन से शरीर अधूरा हो जाता है। ऐसा होने पर मृतक को मोक्ष नहीं मिलता।
समाधान: स्कूल-कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम हों। सोशल मीडिया और धर्मगुरुओं के साथ मिलकर कैंपेन, अंगदाता परिवारों का सम्मान।
4. ब्रेनडेड करने की गाइडलाइन अस्पष्ट: ब्रेनडेड डिक्लेरेशन की भारत में गाइडलाइन बहुत पुरानी है और राज्यों में अनुपालन अलग-अलग। डॉक्टरों को कानूनी उलझन का डर रहता है।
समाधान: गाइडलाइन को डब्ल्यूएचओ स्टैंडर्ड के अनुसार अपडेट किया जाए। हर अस्पताल में ब्रेनडेड सर्टिफिकेशन पैनल अनिवार्य।
5. प्रोत्साहन की कमी: ऑर्गन डोनेशन को बढ़ाने के लिए सरकार, डॉक्टर और समाज तीनों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, पर प्रोत्साहन का अभाव है।
समाधान: ऑर्गन डोनेशन परफॉर्मेंस इंडेक्स और इंसेंटिव लागू हो। सफल केस का प्रमुखता से प्रचार हो।


