सेहत का कबाड़…:दो लाख लोगों के लिए खतरा बने 50 प्लास्टिक कारखाने

कबाड़खाना… बाइक से लेकर ट्रक तक के सेकंड हैंड पार्ट्स चाहिए तो यही नाम याद आता है। लेकिन, यहां अवैध रूप से 50 से ज्यादा प्लास्टिक रिसाइकल कारखाने भी चल रहे हैं। जो इसके आसपास कॉलोनियों में रहने वाले करीब दो लाख लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गए हैं। कबाड़खाना की संकरी गलियों के बीच जगह-जगह प्लास्टिक वेस्ट के ढेर मिल जाते हैं। थोड़ी सी तहकीकात करने पर प्लास्टिक वेस्ट से ग्रेन्युअल (दाने) बनाने की मशीनें नजर आ जाती हैं। ये दाने प्रदेश और देश के औद्योगिक क्षेत्रों में भेजे जाते हैं, जहां इनकी पॉलीथिन बनती हैं। हर हफ्ते कम से कम दो बार यहां छोटी-बड़ी आग लगती है। तब प्लास्टिक जलने से उठने वाला धुआं खासा परेशान करता है। इलाका इतना संकरा है कि फायर ब्रिगेड का जाना मुश्किल है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने भोपाल में आटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया से स्टडी कराई थी। तब डीआईजी बंगला(कबाड़खाना के पास) में पीएम-10 का स्तर 225 था, जो सबसे ज्यादा था। जोखिम क्यों… हफ्ते में 2 बार लगती है आग, क्षेत्र इतना संकरा कि दमकल पहुंचना मुश्किल बढ़ता प्रदूषण… ई-वेस्ट को तोड़कर निकालते हैं महंगी धातुएं, निकलती हैं खतरनाक गैसें नहीं लग पा रही प्लास्टिक पर रोक… भोपाल में कागजों पर साल 2022 से सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगी हुई है। लेकिन, शहर भर में दुकानदार पॉलीथिन बैग में ही सामान दे रहे हैं। होटल-ढाबों में डिस्पोजेबल कप-प्लेट का उपयोग जारी है। नगर निगम बीच-बीच में अभियान चलाता है, लेकिन रोक नहीं लग पा रही है। आज भी नगर निगम के सभी ट्रांसफर स्टेशन और आदमपुर छावनी पर 10 से 12 टन प्लास्टिक कचरा पहुंच रहा है। लगभग इतना ही कचरा कबाड़ियों के माध्यम से कबाड़खाना पहुंच रहा है और वहां रिसाइकल हो रहा है। ई-वेस्ट के हाल और भी खराब
मप्र की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन समिति के सदस्य इम्तियाज अली बताते हैं कि ई- वेस्ट को लेकर हालात और भी खराब हैं। पुराने मोबाइल से लेकर लैपटॉप और दूसरे ई-वेस्ट साधारण कचरे के साथ कबाड़खाना पहुंच रहे हैं। इनको तोड़कर महंगी धातुएं निकाली जाती हैं। इस कोशिश में खतरनाक गैसें निकलती हैं। निगम के पास रिकॉर्ड ही नहीं
नगर निगम ने यहां करीब 800 प्लॉट न्यू कैटेगराइज्ड मार्केट के नाम से दिए हैं। अभी करीब 70 प्लॉट की लीज निरस्त करने का मामला फाइलों में चल रहा है, क्योंकि उन्होंने लीज रेंट जमा नहीं किया है। दूसरी ओर निगम के पास ये रिकॉर्ड ही नहीं है कि किस प्लॉट पर क्या कारोबार चल रहा है। आबादी से दूर शिफ्ट किए जाने चाहिए ये प्लास्टिक कारखाने किसी भी उद्योग संचालित करने के लिए उद्योग विभाग, जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय की अनुमति के साथ पॉल्यूशन क्लीयरेंस भी लगता है। प्लास्टिक रिसाइकल उद्योग के लिए नियम और भी कड़े हैं। अवैध रूप से चल रहे इन उद्योगों के लिए आबादी से दूर स्थान चिह्नित कर इन्हें शिफ्ट किया जाना चाहिए। -बृजेश शर्मा, रीजनल ऑफिसर, पीसीबी, भोपाल

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