हजारीबाग के जुलू पार्क के पास का मोहल्ला आज सुनसान है। दिन भर चहल-पहल वाला शहर का यह कोना आज चुप्पी साधे हुए है। इसी मोहल्ले में रहते हैं अजिंदर सिंह बख्शी और उनका परिवार। इसी परिवार के छोटे बेटे थे कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी। करमजीत अब नहीं रहे। उन्होंने वीरगति पाई। जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में एलओसी के पास पेट्रोलिंग के दौरान हुए आईईडी ब्लास्ट में एक कैप्टन सहित दो सैन्य कर्मी शहीद हो गए। एक अन्य जवान भी घायल हो गया। इस धमाके में वीरगति पाने वाले कैप्टन करमजीत सिंह बख्शी हैं। कैप्टन और उनका परिवार शादियों की तैयारी में जुटा था। 2 महीने बाद कैप्टन सेहरा बांधे अपनी दुल्हन को घर लाते, लेकिन वो तिरंगे में लिपटकर घर लौटे। जिस घर से 5 अप्रैल को बारात निकलने वाली थी। उस घर से आज उनकी अर्थी उठी। कैप्टन करमजीत की अंतिम यात्रा में पूरा शहर उमड़ पड़ा। लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। लड़की भी आर्मी में मेडिकल ऑफिसर साल 2018 में सेना के व्हाइट कोर कमान में योगदान देने वाले कैप्टन करमजीत की शादी जिस लड़की से होने वाली थी वह भी आर्मी में है। जम्मू-कश्मीर में बतौर मेडिकल ऑफिसर पोस्टेड है। दोनों की लव मैरिज होने वाली थी। पहले प्रेम, फिर शादी का सपना और उस सपने को पूरा करने घर में जो तैयारियां चल रही थी, सब धरी की धरी रह गई। पेशे से टेंट का व्यवसाय करने वाले अजिंदर सिंह बख्शी दूसरे के घरों में टेंट-सजावट करते हैं। वो कहते हैं अब इस घर में कहानियां रह गई। पिता अजिंदर के मुताबिक हजारीबाग के संत जेवियर स्कूल से 12वीं की पढ़ाई, फिर इंजीनियरिंग के बाद उसने पूछा था- पापा, मैं सेना में जाना चाहता हूं। मैंने ही सहमति दी थी। बड़े अरमान थे कि बेटे की बारात घर से निकलेगी। अब बेटा कहानियों में रह गया। पहले प्रयास में हुए अनफिट, दूसरे प्रयास में बने कैप्टन कैप्टन करमजीत सिंह बख्शी की दीवानगी आर्मी के लिए बिल्कुल अलग थी। सीडीएस से आर्मी में जाना चुना। पहले प्रयास में अनफिट कर दिए गए थे। उनका एक हाथ टूट गया था, इस वजह से पहले प्रयास में मेडिकल के दौरान अनफिट कर दिए गए थे। उनके परिवार के सदस्य बताते हैं कि पहले प्रयास में अनफिट होने के बाद भी निराश नहीं हुआ। हाथ का फिर से इलाज कराया। हाथ सीधा हुआ तो फिर सीडीएस के माध्यम से पहुंचे। इस बार चुन लिए गए। उनकी पहली पोस्टिंग ही सियाचिन में हुई थी। दूसरी पोस्टिंग अमृतसर में थी। जम्मू में वे जहां शहीद हुए वो करमजीत की तीसरी पोस्टिंग थी। ऑपरेशन मेघदूत में मिला था सम्मान कैप्टन करमजीत सिंह बख्शी अपनी पहली ही पोस्टिंग में कमाल कर दिया था। इसके लिए उन्हें सम्मान भी दिया गया था। करमजीत की पहली पोस्टिंग विश्व की सबसे ऊंचे वॉर एरिया सियाचिन में थी। यहां उन्होंने कई सराहनीय काम किए थे। साल 2018-20 में चलाए गए विशेष अभियान में उन्होंने कमाल कर दिया था। इसके लिए उन्हें ऑपरेशन मेघदूत के नाम से एक बैटल स्मृति चिन्ह भी दिए गए थे। यह प्रतीक चिन्ह आज भी उनके घर में लगा हुआ है। करमजीत का न केवल सेना बल्कि स्कूल के दिनों में भी स्पोटर्स से काफी लगाव था। वह जितना अच्छा क्रिकेट खेलते थे उतना ही माहिर बैडमिंटन और हॉकी में भी थे। संत जेवियर्स स्कूल के शिक्षकों के मुताबिक अपने स्कूल के दिनों में उनका हॉकी को लेकर काफी प्रेम था।


