राजधानी में आम लोगों को घर के पास ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाए गए हमर अस्पताल का बुरा हाल है। हालात ये हैं कि कई केंद्रों में ड्रेसिंग जैसी बुनियादी सुविधा भी नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रही है। मरीज जब छोटे-मोटे घाव, चोट या फॉलोअप के लिए स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते हैं तो उन्हें सीधे मेडिकल कॉलेज या बड़े अस्पताल जाने की सलाह दी जा रही है। इससे न केवल मरीजों को अतिरिक्त आर्थिक और मानसिक परेशानी उठानी पड़ रही है, बल्कि बड़े अस्पतालों पर भी अनावश्यक बोझ बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की योजना थी कि शहरी स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत कर छोटे इलाज, ड्रेसिंग, जांच और दवाइयों की सुविधा मोहल्ले और वार्ड स्तर पर दी जाए, ताकि मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों पर दबाव कम हो। लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही है। स्टाफ की भारी कमी, संसाधनों का अभाव और व्यवस्थागत लापरवाही के कारण राजधानी के कई स्वास्थ्य केंद्र केवल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। इलाज नहीं मिला
उरकुरा निवासी राकेश मिश्रा ने बताया कि फैक्ट्री में उनके हाथ में एक मशीन गिर गई थी। उनका अंगूठा सूज गया है। इसके साथ ही उसमें पानी भर गया है। इसे निकलवाने और इसका इलाज करवाने जब वे भनपुरी के स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे तो उन्हें कहा गया कि यहां ड्रेसर नहीं है। उन्हें अंबेडकर अस्पताल जाने कह दिया गया। सामान ही नहीं था
भाठागांव निवासी कुछ दिन पहले बाइक से गिर गए थे। पैर में गहरी चोट आने के बाद वे पास के भाठागांव के हमर अस्पताल पहुंचे। वहां मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने बताया कि ड्रेसिंग का सामान उपलब्ध नहीं है और डॉक्टर भी नियमित नहीं हैं। रमेश को सीधे मेडिकल कॉलेज रायपुर जाने की सलाह दे दी गई। सुविधाओं में भी पीछे
रायपुर समेत प्रदेश के कई जिलों में शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को हमर अस्पताल के रूप में डेवलप किया गया है। लेकिन ये केंद्र सुविधाओं के मामले में अब भी पीछे ही हैं। जिस सेंटर की बात कर रहे हैं, वहां हो सकता है स्टाफ ना हो, लेकिन ड्रेसिंग तो हर केंद्र में करने के आदेश दिए हैं। लेकिन इसकी जांच करवाता हूं।
– डॉ मिथिलेश चौधरी, सीएमएचओ, रायपुर।


