बाघों की गणना के बाद अब तालाबों में रहने वाले पक्षियों की प्रजातियां पता लगाने के लिए दो दिनी सर्वे शनिवार से शुरू हो गया। सुबह 6 बजे से पक्षी विशेषज्ञ, वन विभाग के एक्सपर्ट तालाबों पर पहुंचे। दूरबीन की मदद से पक्षियों की पहचान की गई। कैमरों से उनके फोटो भी लिए। अच्छी बात यह है कि 12 महीने पाए जाने वाले पक्षियों के साथ प्रवासी पक्षी भी तालाबों में नजर आए। इसका मतलब है हमारे तालाब सेहतमंद हैं। तालाब प्रवासी पक्षियों के रहवास के मुताबिक हैं। रविवार को भी बर्ड वॉचिंग की जाएगी। सर्वे के बाद सभी फोटो एक्सपर्ट के बीच रखे जाएंगे। इससे पता चलेगा कि तालाबों में पक्षियों की कितनी प्रजातियां हैं। डीएफओ प्रदीप मिश्रा के मुताबिक एशियन वाटरबर्ड सेंसस एक अंतरराष्ट्रीय नागरिक-विज्ञान कार्यक्रम है, जो हर साल एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कई देशों में किया जाता है। भारत में यह कार्यक्रम आर्द्रभूमियों की निगरानी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और रामसर कन्वेंशन के तहत देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को पूरा करने में मदद करता है। सर्वे में 50 से अधिक प्रशिक्षित पक्षी प्रेमी शामिल हुए पिछले रिकॉर्ड और हालिया निरीक्षण के आधार पर इंदौर जिले में 20 से अधिक झीलों, तालाबों, जलाशयों और नदी किनारे क्षेत्रों को सर्वेक्षण के लिए चुना गया है। इन क्षेत्रों में स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के पक्षी पाए जाते हैं। सर्वे में 50 से अधिक प्रशिक्षित पक्षी प्रेमी वन विभाग के कर्मचारियों के साथ भाग ले रहे हैं। हर टीम को तय स्थान दिए हैं, ताकि दोहराव न हो और डेटा सही रहे। तालाबों के आसपास लाइटिंग कम करने पर जोर दिया जा रहा है। ई-बर्ड एप का उपयोग सर्वे के दौरान सभी पक्षियों की जानकारी ई-बर्ड एप पर दर्ज की जाएगी। इससे हर रिकॉर्ड स्थान, समय और तारीख के साथ सुरक्षित होगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना के लिए उपयोगी बनेगा। इसके साथ ही आर्द्रभूमि मूल्यांकन फॉर्म भी भरा जाएगा, जिसमें पानी की स्थिति, वनस्पति, मानवीय गतिविधियां और अन्य दबावों की जानकारी दर्ज की जाएगी। इससे पक्षियों की संख्या को पर्यावरण की स्थिति के साथ जोड़कर समझा जा सकेगा।


