नया रायपुर में शुक्रवार सुबह रायपुर साहित्य उत्सव का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की बातें साझा कीं। साहित्य की भूमिका पर उन्होंने कहा कि साहित्य समाज और राजनीति को दिशा देता है। उन्होंने भारत की विश्व में स्थिति पर चर्चा की। युवाओं के हुनर, स्टार्टअप समेत बदले भारत पर अपनी राय रखी। कार्यक्रम के दौरान ही उन्होंने दैनिक भास्कर से विभिन्न मुद्दों पर विशेष बातचीत की। प्रश्न- आप पत्रकारिता में रह चुके हैं, अभी पॉलिटिक्स में है। बदले दौर में पॉलिटिक्स, सत्ता और पत्रकारों के बीच संवाद में कमी आई है। दूरी बढ़ रही है, आप इसे कैसे देखते हैं? हरिवंश: मेरा मानना है कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे को और बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करनी चाहिए। अपने निजी अनुभव से मैं दो-तीन बातें कह सकता हूं। पत्रकार रहते हुए कई बार मुझे लगता था कि कोई काम इस तरह हो सकता है या होना चाहिए। लेकिन जब मैं व्यवस्था के भीतर आकर चीज़ों को देखता हूं, तो उसकी चुनौतियां भी समझ में आती हैं, जिनका एहसास बाहर रहते हुए नहीं हो पाता। असल में समाज को बदलना हम सबका उद्देश्य है। पत्रकारों का भी और राजनीति का भी। हम जहां खड़े हैं, वहां से समाज को आगे ले जाना, उसे बेहतर बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। हमारा दायित्व है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज छोड़कर जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लाल किले से अपने संबोधन में कहा था कि पिछली पीढ़ी ने आज़ादी के लिए अपनी कुर्बानी दी, अपना जीवन खपा दिया, तभी हम आज़ादी में खुलकर सांस ले पा रहे हैं। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने को देश के निर्माण में खपा दें। यही काम पत्रकारिता भी करती है और मैं मानता हूं कि राजनीति का उद्देश्य भी यही है। जहां भी यह महसूस हो कि संवाद में दूरी आ रही है, वहां दोनों को एक-दूसरे को समझने की और कोशिश करनी चाहिए। प्रश्न- सामाजिक बदलाव के साथ आर्थिक मोर्चे पर भारत ने जो तरक्की की है उसे आप कैसे देखते हैं? देश में युवाओं के भविष्य को कैसे देखते हैं? हरिवंश: आप स्वयं देखिए कि भारत स्टार्टअप के क्षेत्र में कहां पहुंच चुका है। दैनिक भास्कर ने भी इस पर रिपोर्ट की है। स्पेस सेक्टर में भारत ने कितनी प्रगति की है। आज हम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहे हैं। बदले हुए हालात में भारत सुरक्षा के लिहाज से अंतरिक्ष से निगरानी करने की क्षमता भी विकसित कर चुका है। ये सारे काम कौन कर रहा है? ये हमारे देश की युवा प्रतिभाएं कर रही हैं, लड़के और लड़कियां। सबसे ज्यादा आश्चर्य तब होता है जब आप इसरो के वैज्ञानिकों की पृष्ठभूमि देखते हैं। वे सामान्य परिवारों से आए बच्चे हैं। स्टार्टअप शुरू करने वाले भी अधिकतर सामान्य घरों से निकले युवा उद्यमी हैं। दुनिया में कोई भी, चाहे कितना ही विकसित देश क्यों न हो, सभी को सरकारी नौकरी नहीं दे सकता। क्या आपने ऐसा कहीं सुना है? आज भारत की आबादी दुनिया में सबसे अधिक है, जबकि क्षेत्रफल के हिसाब से हम छठे या सातवें स्थान पर हैं। अमेरिका की आबादी लगभग 33 करोड़ है और उसे सबसे विकसित देश कहा जाता है, फिर भी हमारे यहाँ उनसे अधिक लोग सरकारी नौकरियों में हैं। यह हमारे मीडिया का भी दायित्व है कि समाज को जागरूक करे। पत्रकारिता के दौरान जब भी अवसर मिला, हमने यह प्रयास किया। समाज में सफाई हो, चाहे घर हो या ट्रेन, उसकी जिम्मेदारी भी हमारी ही है। गांधीजी भी यही कहते थे और संविधान में भी नागरिक कर्तव्यों का स्पष्ट प्रावधान है। हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना होगा और इसकी चेतना समाज में बनाए रखनी होगी। प्रश्न- वर्तमान परिदृश्य में मीडिया की भूमिका को कैसे देखते हैं, तंत्र या व्यवस्था सुधार में पत्रकारिता क्या करें? हरिवंश: आज हम भ्रष्टाचार, घूसखोरी और अधिकारियों से जुड़ी कई खबरें देखते हैं। यह प्रशासनिक पक्ष है, वह अपना काम कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि हमारे घरों और समाज में क्या परंपरा रही है? क्या हम गलत तरीके से कमाए गए धन का सामाजिक बहिष्कार करते हैं? कभी यह काम विनोबा भावे करते थे, कभी जयप्रकाश नारायण करते थे। लोहिया जैसे लोग इन सवालों को उठाते थे। आज कल्पना कीजिए, यदि हमारे घर का कोई सदस्य घूस लेकर आए और हम उसका बहिष्कार करना शुरू कर दें। उसकी पत्नी, पूरा परिवार, तो ऐसा माहौल कौन बनाएगा? यह काम साहित्यकार, पत्रकार और सामाजिक चेतना से जुड़े लोग ही कर सकते हैं। मैं एक छोटा सा प्रसंग सुनाता हूं। मदन मोहन मालवीय लगभग 80 वर्ष की आयु में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति आवास में रहते थे। उनकी रसोई अलग चलती थी। उनके परिवार की रसोई अलग थी। उनके पोते गिरिधर मालवीय इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बने। गिरिधर ने मुझे बताया कि वे सेंट्रल स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उन्हें परीक्षा देने जाना था, लेकिन घर में नाश्ता तैयार नहीं था। घर वालों ने सुझाव दिया कि मदन जी की रसोई से नाश्ता दे दिया जाए। मदन जी ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि गिरिधर को ऐसे ही भेज दीजिए, वह बाहर कहीं नाश्ता कर लेंगे। कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि मैं देशसेवा में हूं और मुझे जो दान मिलता है, उसी से मेरा भोजन बनता है। गिरिधर अभी देशसेवा नहीं कर रहे हैं, इसलिए मेरी रसोई का भोजन उन्हें नहीं करना चाहिए। गांधीजी के आश्रम में भी एक-एक पैसा पूरी ईमानदारी से आता था और उसी से खर्च चलता था। नैतिकता पर ऐसी सख्ती मीडिया और नागरिकों को खुद करनी होगी। यह काम सरकार नहीं कर सकती। मीडिया और सामाजिक सुधार से जुड़ी शक्तियों को अपना यह दायित्व निभाना होगा, तभी नैतिक रूप से मजबूत समाज बनेगा। प्रश्न: पत्रकार हरिवंश जब उपसभापति के तौर पर आसंदी पर बैठते हैं तो एक बड़ी चुनौती क्या लगती है? हरिवंश: संसदीय लोकतंत्र हमारी सबसे बड़ी ताकत है। दुनिया में स्थायी परिवर्तन केवल संसदीय लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से ही संभव है। 2014-15 में जब मैं डिफेंस कमेटी का सदस्य था, तब हमारे अध्यक्ष खंडूरी जी हुआ करते थे। दो-दो बार मुख्यमंत्री रह चुके, अत्यंत ईमानदार व्यक्ति, जिन्होंने वाजपेयी जी के कार्यकाल में गोल्डन क्वाड्रिलेटरल रोड परियोजना को अंजाम दिया। उस कमेटी में कई बहुत बड़े-बड़े लोग थे। अक्सर चर्चा होती थी कि चीन की तैयारी क्या है, उसकी रणनीति क्या है। कई लोग कहते थे कि चीन की व्यवस्था अलग है। कम्युनिस्ट देश है, वहां निर्णय तुरंत लिए जाते हैं और लागू भी हो जाते हैं। तब मैं कहा करता था कि सवाल यह नहीं है कि वहां व्यवस्था कौन-सी है। सवाल यह है कि आपका पड़ोसी वही है और देर-सवेर उसी से चुनौती आएगी। यदि आपकी आर्थिक ताकत कमजोर होगी तो आपको निर्णय लेने होंगे। लेकिन मैं हमेशा यह भी कहता था कि लोकतांत्रिक शासन में परिवर्तन स्थायी होता है। उसमें चाहे जितनी बहस हो, मतभेद हों, अंततः जनमत के जरिए समाधान निकलकर आता है। आज यही देश कोविड के बाद दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। मैंने आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और दुनिया के शीर्ष अर्थशास्त्रियों की रिपोर्टों का उल्लेख किया है। एक समय 2013 तक भारत को फ्रैजाइल इकोनॉमी कहा जाता था। आज हम इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं।


