हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार के फैसले को रद्द किया:नेट चार्ज पर नहीं लगा सकते इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी, उपभोक्ता के पैसे समायोजित करें

54 लाख उपभोक्ताओं को फायदा, बिल में समायोजित होगी राशि
झारखंड हाईकोर्ट ने बिजली बिल में नेट चार्ज पर इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी लगाने के सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस तरलाेक सिंह चाैहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार के उस फैसले को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें जिसमें इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी नेट चार्ज के आधार पर लेने का निर्णय लिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि बिजली ड्यूटी का आधार यूनिट है, न कि नेट चार्ज। इससे हटकर बनाई गई व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 265 के विपरीत है। इसके साथ ही कोर्ट ने 7 जुलाई 2021 के बाद बिजली उपभोक्ताओं से लिए गए इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी की राशि काे उपभोक्ताओं के बिजली बिल में समायोजित करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम, 1948 की चार्जिंग सेक्शन के विपरीत जाकर झारखंड में नई गणना पद्धति लागू की गई, जाे कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने कैप्टिव पावर प्लांट और अन्य की ओर से दाखिल याचिकाओं को निष्पादित कर दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद करीब 54 लाख से ज्यादा घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी। अब उनसे वसूली गई राशि को उनके बिजली बिल में समायोजित किया जाएगा। इससे राज्य सरकार के खजाने पर अरबों रुपए का बोझ बढ़ेगा। वह सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है, याचिकाकर्ता-सरकार का पक्ष व हाईकोर्ट का फैसला याचिकाकर्ता के वकील एमएस मित्तल ने कोर्ट को बताया कि बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम, 1948 की धारा 3 के अनुसार बिजली बिल की वसूली उपभोग की गई प्रति यूनिट के आधार पर होती थी। घरेलू उपभोक्ताओं से प्रति यूनिट 5 पैसे की दर से इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी की वसूली होती थी। लेकिन राज्य सरकार ने जुलाई 2021 में अधिनियम में संशोधन किया। फिर बिजली खपत के आधार पर बने नेट चार्ज पर 6% ड्यूटी लगा दी। राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता सचिन कुमार ने कहा कि अधिनियम, 1948 राज्य को दरें तय करने का अधिकार देती है। प्रथम संशोधन अधिनियम, 2021 और द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2021 दोनों ही प्रकाशन की तिथि से लागू किए गए हैं। नियम, 2021 के द्वारा केवल ‘नेट चार्ज’ की गणना को स्पष्ट किया गया है। झारखंड में बिजली की दर छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों से कम है। ऐसे में राज्य को राजस्व बढ़ाने का अधिकार है। टैरिफ तय करने का अधिकार नियामक आयोग के पास है, जबकि विद्युत शुल्क एक कर है, जो विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है। संशोधित प्रावधान से कर लगाने की प्रणाली नहीं बदली है, केवल दर और गणना पद्धति को स्पष्ट किया गया है। -शेष पेज 9 पर 270 यूनिट खर्च तो 98 रुपए का पड़ रहा बोझ राज्य सरकार बिजली की खपत की यूनिट पर पांच पैसे इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी लेती थी, उसे नेट चार्ज पर करने प्रतिशत में फिक्स कर दिया गया। इस वजह से लाखों उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया। हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार को यूनिट में इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी लेना होगा और जुलाई 2021 से लिए गए इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी को बिजली बिल में समायोजित करना होगा। मान लीजिए सतीश कुमार के घर में नवंबर माह में कुल बिजली की खपत 270 यूनिट हुई। कुल यूनिट पर नेट चार्ज 1853 रुपया बना। इस पर 6 प्रतिशत की दर से इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी लगाई गई,जो 111 रुपए हैं। अगर पुरानी व्यवस्था के तहत ड्यूटी ली जाती जो प्रति यूनिट पांच पैसे थी। ऐसे में सतीश कुमार को 270 यूनिट के बदले मात्र 13.50 रुपए ही इलेक्ट्रिसिटी बिल देना होगा। ऐसे में उन्हें 98 रुपए की बचत होती। निश्चित रूप से उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी,क्योंकि हाईकोर्ट के डबल बेंच से यह आदेश हुआ है। अब सरकार के पास उपभोक्ताओं को राहत देने या सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प है।- देवेश अजमानी, वरीय अधिवक्ता, हाईकोर्ट

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