छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने तलाक के एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल पत्नी से अलग रहना तलाक का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक के लिए क्रूरता और परित्याग का ठोस आधार होना जरूरी है। हाईकोर्ट ने मामले में पति की अपील को खारिज करते हुए बेमेतरा के फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है। दरअसल, बेमेतरा जिला निवासी गिरधर दुबे ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी लगाई थी। उनका कहना था कि उनकी पत्नी पिछले 14-15 वर्षों से उन्हें छोड़कर बेटी और दामाद के साथ रह रही हैं, उनसे झगड़ा करती थीं और मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थीं। दोनों का विवाह करीब 35 वर्ष पूर्व हुआ था। उनसे दो संतानें जीवित हैं, जिनका विवाह हो चुका है। पति पेशे से पुजारी हैं और इसी आधार पर उन्होंने तलाक की मांग की थी। पत्नी ने रखा अपना पक्ष
पत्नी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें पति द्वारा गाली-गलौच, मारपीट और चरित्र पर शक करने जैसी प्रताड़नाएं झेलनी पड़ीं। उन्होंने यह भी बताया कि वे ब्लड प्रेशर और शुगर की मरीज हैं, लेकिन पति ने कभी उनके इलाज का खर्च नहीं उठाया। मजबूरी में उन्हें बेटी के घर रहना पड़ा। फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था केस
फैमिली कोर्ट, बेमेतरा ने 5 जुलाई 2023 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने माना कि, पत्नी द्वारा दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जानबूझकर परित्याग साबित नहीं हुआ। पति द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप अस्पष्ट और सामान्य हैं। प्रस्तुत साक्ष्य तलाक के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हाईकोर्ट ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि, केवल अलग रहना ही परित्याग नहीं माना जा सकता है। क्रूरता के लिए ठोस घटनाएं, विशिष्ट आरोप और प्रमाण आवश्यक होते हैं। पति के गवाहों के बयान भी सामान्य और अप्रमाणिक पाए गए हैं। महिला प्रकोष्ठ की काउंसलिंग रिपोर्ट से पत्नी के आरोप अधिक विश्वसनीय प्रतीत होते हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि तलाक जैसे गंभीर मामले में अनुमान या सामान्य आरोपों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का निर्णय न तो मनमाना है और न ही रिकॉर्ड के विपरीत। इसलिए पति की अपील को खारिज कर दिया गया।


