मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बीएड कॉलेजों और छात्रों की उस उम्मीद पर पानी फेर दिया है, जिसमें उन्होंने काउंसलिंग और एडमिशन की राहत मांगी थी। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए इन कॉलेजों को वाणिज्यिक दुकानें करार दिया। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि जीवाजी यूनिवर्सिटी ने इन कॉलेजों को संबद्धता (एफिलिएशन) न देकर बिल्कुल सही फैसला लिया है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जिन कॉलेजों ने गलत तरीके से छात्रों को प्रवेश दिया है, वे तत्काल उनकी पूरी फीस वापस करें। इसके साथ ही, याचिका लगाने वाले कॉलेजों पर 25-25 हजार रुपए की कॉस्ट भी लगाई गई है। यह राशि किशोर न्याय फंड में जमा करनी होगी। छात्रों ने गलत कॉलेज चुना, तो सहानुभूति कैसी?
अदालत ने उन छात्रों को भी राहत देने से इनकार कर दिया जिन्होंने सहानुभूति के आधार पर कोर्स जारी रखने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा- छात्रों ने बिना जांच-पड़ताल किए गलत महाविद्यालय का चयन किया। वे केवल अपनी फीस वापसी के हकदार हैं, पाठ्यक्रम जारी रखने के नहीं।” एनसीटीई की भूमिका में सुधार की आवश्यकता हाई कोर्ट ने नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठाई। कोर्ट ने कहा कि एनसीटीई को अपनी कार्यशैली में सुधार करना होगा ताकि उसके नाम पर कोई गड़बड़ी न हो सके। यह है मामला… विद्या-सुधा वेलफेयर फाउंडेशन समिति और अन्य कॉलेजों ने याचिका दायर की थी। दरअसल, एसटीएफ द्वारा आपराधिक केस दर्ज किए जाने के कारण जीवाजी यूनिवर्सिटी ने सत्र 2025-26 के लिए इन कॉलेजों को संबद्धता नहीं दी थी। इसी के खिलाफ कॉलेज कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन राहत नहीं मिली।


