हाई कोर्ट ने पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश को लेकर अपने आदेश में बदलाव किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले छात्रों को संस्थागत कोटा के तहत आरक्षण देना वैधानिक रूप से मान्य है। हाई कोर्ट ने अपने पिछले आदेश के उस हिस्से को हटा दिया है, जिसमें राज्य सरकार को श्रेणी के आधार पर भेदभाव न करने का निर्देश दिया गया था। अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के तन्वी बहल केस में दिए गए फैसले के अनुरूप संस्थागत आरक्षण लागू कर सकेगी। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने दलील दी कि सरकार ने निवास आधारित आरक्षण को खत्म कर दिया है और अब केवल संस्थान आधारित वरीयता दी जा रही है। उन्होंने तर्क दिया कि एमबीबीएस के 50% छात्र ऑल इंडिया कोटे से आते हैं, जो दूसरे राज्यों के होते हैं, इसलिए यह निवास आधारित भेदभाव नहीं है। यह भी बताया कि सरकार ने 1 दिसंबर 2025 को नियमों में संशोधन कर 50% सीटें संस्थागत आरक्षण और 50% ओपन मेरिट के लिए तय कर दी हैं। फेडरेशन ने नियम तत्काल वापस लेने की मांग की
हाईकोर्ट के आदेश के बाद छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन ने कहा है कि जब संस्थागत वरीयता वैध है, तो शासन के पास अपने ही छात्रों से सीट छीनने का कोई अधिकार नहीं है। राज्य कोटे की सीटों को स्टेट ओपन करना छात्रों के अधिकारों का हनन है। फेडरेशन ने मांग की है कि 1 दिसंबर 2025 के पीजी प्रवेश नियम को निरस्त किया जाए, संस्थागत वरीयता पुनः लागू हो, नई अधिसूचना जारी की जाए। प्रदेश में पीजी की 566 सीटें
प्रदेश में पीजी की कुल 566 सीटें हैं जिनमें 186 सीटें निजी कॉलेजों में हैं। इनमें राज्य कोटा की 350 व ऑल इंडिया कोटा की 216 सीटें हैं। रायपुर के नेहरु मेडिकल कॉलेज में 146 सीटों में से 74 राज्य और 72 ऑल इंडिया कोटे, बिलासपुर में 89 में से 42 राज्य और 47 ऑल इंडिया कोटे, जगदलपुर में 28 में 15 राज्य और 13 ऑल इंडिया कोटे की हैं। राजनांदगांव में 18 में से 9-9, अंबिकापुर में 46 में से 23-23 हैं। रायगढ़ की 40 में 20 राज्य और 20 ऑल इंडिया, कोरबा की 13 में से 7 राज्य और 6 ऑल इंडिया, निजी कॉलेजों में भिलाई की 57 सीटों में 49 राज्य और 8 अन्य कोटे की हैं। रायपुर के दो निजी मेडिकल कॉलेज में क्रमशः 63 सीटें (54 राज्य, 9 अन्य) और 66 सीटें (57 राज्य, 9 अन्य) उपलब्ध हैं। राज्य के मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले छात्र न सिर्फ यहीं पढ़ाई करते हैं, बल्कि दो साल की ग्रामीण सेवा भी देते हैं। ऐसे में राज्य कोटे की सीटों को बाहरी छात्रों के लिए खोल देना, उनके लिए प्रतिस्पर्धा को असमान और चुनौतीपूर्ण बना देता है।
-डॉ. हीरा सिंह लोधी, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ डाक्टर्स फेडरेशन


