हाड़ौती में पेड़ पौधों से भी हो रही लोगों को:कोटा में हाड़ौती एलर्गोकॉन का आयोजन रविवार को, 350 चिकित्सक करेंगे शिरकत

देश में लगभग 20 से 25 प्रतिशत आबादी किसी न किसी प्रकार की एलर्जी से प्रभावित है। श्वसन तंत्र से जुड़ी एलर्जी के प्रमुख कारणों में हाउस डस्ट माइट, कॉकरोच, मच्छर, फफूंद, जानवरों का फर, खाद्य पदार्थ, दवाइयाँ तथा पेड़-पौधों के पराग कण शामिल हैं। हाउस डस्ट माइट का आकार बाल से लगभग 10 गुना छोटा होता है, इसलिए यह आंखों से दिखाई नहीं देता, फिर भी यह एलर्जी का एक बडृा कारण है। पराग कण भी एलर्जी के प्रमुख कारणों में से एक हैं। देश में लगभग 9 से 30 प्रतिशत जनसंख्या में आंखों की एलर्जी का मुख्य कारण पराग कण माने जाते हैं। यह समस्या विशेष रूप से 8 से 30 साल की आयु वर्ग में अधिक देखने को मिलती है। डॉ. केवल कृष्ण डंग एवं वनस्पति विभाग, राजकीय महाविद्यालय कोटा की प्रोफेसर डॉ. नीरजा श्रीवास्तव की ओर से एयर एलर्जी और मानव स्वास्थ्य पर अखिल भारतीय समन्वित परियोजना के अध्ययन के आधार पर हाड़ौती क्षेत्र में एलर्जी उत्पन्न करने वाले लगभग 28 प्रकार के पेड़-पौधों की पहचान की गई है। इनमें प्रमुख रूप से विलायती बबूल, एरिया, गाजर घास, बथुआ, बंदर की रोटी, कांटेदार चौलाई, पीली कांटेली, अल्स्टोनिया तथा कोनोकार्पस शामिल हैं। डॉ. केवल कृष्ण डंग एवं डॉ. संजय जायसवाल ने बताया कि18 जनवरी रविवार को कोटा में हाडौती एलर्गोकॉन का आयोजन किया जा रहा है। इस कॉन्फ्रेंस में कोटा, बारां, बूंदी, झालावाड़, सवाई माधोपुर एवं भरतपुर से लगभग 350 चिकित्सकों के भाग लेने की संभावना है। सम्मेलन में बच्चों एवं वयस्कों में होने वाले एलर्जी रोगों जैसे अस्थमा, नाक की एलर्जी (छींके, नजला, नाक में खुजली), आंखों की एलर्जी (आंखों में लालिमा व पानी आना) तथा त्वचा की एलर्जी (चक्कते) के निदान एवं उपचार पर चर्चा की जाएगी। साथ ही उफऊ, स्किन प्रिक टेस्ट तथा इम्युनोथैरेपी जैसी आधुनिक जांच एवं उपचार विधियों पर भी विशेषज्ञ अपने विचार साझा करेंगे। डॉ. केवल कृष्ण डंग ने बताया कि एलर्जी और एलर्जी संबंधी विकारों, आ रही समस्या, उनका समाधान, नई तकनीक, नई दवाएं, आधुनिक मशीनरी पर चर्चा की जाएगी।

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