हाथों के बल उलटा चलकर 3500 KM की नर्मदा परिक्रमा:24 साल के धरमपुरी महाराज खाते हैं एक रोटी, अमेरिका से आए साइंटिस्ट कर रहे रिसर्च

पिछले साल का प्रयागराज महाकुंभ मेला, तो याद होगा ही। यहां हजारों अघोरियों के हठ योग का अलग-अलग तरीका था। हठयोग का ऐसा ही नजारा इन दिनों मध्यप्रदेश में देखने मिल रहा है। निरंजनी अखाड़े के संत धरमपुरी महाराज अधोमुखी नर्मदा परिक्रमा पर निकले हैं। उन्होंने 3500 किमी की यात्रा हाथों के सहारे चलते हुए यानी हैंड वॉकिंग का संकल्प लिया है। उनकी आस्था का ये रूप जितना अनोखा है, उतना ही कठिन भी है। इस पर अमेरिया से आए उनके एक साइंटिस्ट शिष्य रिसर्च भी कर रहे हैं। आमतौर पर लोग नर्मदा परिक्रमा पैदल, दंडवत या वाहनों से करते हैं, लेकिन धरमपुरी महाराज ने इसे साधना और तपस्या का स्वरूप दिया है। उनका संकल्प विजयादशमी (2 अक्टूबर 2025) से नर्मदा के उद्गम स्थल अनूपपुर जिले के अमरकंटक से शुरू हुआ। यात्रा पूरी करने में 12 साल लगेंगे। यानी ये 2037 में पूरी होगी। इस दौरान वे करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर की दूरी तय करेंगे। अब तक 105 किलोमीटर का सफर तय कर चुके
हाल ही में धरमपुरी महाराज डिंडौरी से 12 किलोमीटर दूर छपरी गांव पहुंचे। घाटी वाले डिंडौरी-मंडला स्टेट हाईवे किनारे उन्होंने शिष्यों के साथ विश्राम के लिए पड़ाव डाला। जैसे ही, ये खबर लोगों तक पहुंची, ग्रामीण उनके दर्शन के लिए पहुंचने लगे। यहां जो भी आ रहा था, वो हांफ रहा था, क्योंकि धरमपुरी महाराज ने जो दूरी तय की है, वो चढ़ाई वाली और कठिन भी है। कुछ देर लोगों से मिलने के बाद वे अपने टेंट में चले गए। उनके साथ चल रहे लोगों ने सभी से सुबह आने कहा। सुबह करीब पौने सात बजे दैनिक भास्कर की टीम फिर से धरमपुरी महाराज के पड़ाव पहुंच गई। हाड़ कंपा देने वाली ठंड के साथ घना कोहरा छाया है। टेंट के अंदर जल रही धूनी की आग बाहर से नजर आ रही है। मंत्रों और घंटी की आवाज से ऐसा लग रहा है, जैसे आरती हो रही है। टीम टेंट के बाहर ही किसी के निकलने का इंतजार करने लगी। इसी बीच महाराज के शिष्य योगेश कटारे बाहर आए। बोले- गुरुजी बुला रहे हैं। महाराज बोले- नर्मदा मां ने ही किया लालन-पालन
अंदर पहुंचते ही देखा कि कड़ाके की ठंड में भी धरमपुरी महाराज लंगोट बांधे बैठे हैं। वे अपने शरीर पर धूनी से निकली भस्म मल रहे हैं। भास्कर टीम के कुछ पूछने से पहले वे मुस्कुराते हुए कहते हैं- जो मैं कर रहा हूं ये अपने लिए नहीं बल्कि आप सब लोगों के लिए है। उम्र पूछने पर चेहरे पर भभूत मलते हुए बाबा कहते हैं 24 का हो गया हूं। डिंडौरी के बजाग विकासखंड के रतना गांव का रहने वाला हूं। गांव के पास से ही नर्मदा का प्रवाह है। माता-पिता के बारे में तो कुछ पता नहीं, लेकिन नर्मदा किनारे का आश्रम याद है। वहीं रहा, बड़ा हुआ। 12 साल का हुआ तो गुरु ने नर्मदा परिक्रमा की आज्ञा दी
धरमपुरी महाराज आगे बताते हैं, सात साल का था, तब पहली बार संतों के साथ बस से भारत भ्रमण पर गया। 12 साल का हुआ, तो गुरु ने नर्मदा परिक्रमा की आज्ञा दी। फिर तो परिक्रमा में ऐसा मन रमा कि एक के बाद एक तीन परिक्रमा और कर ली। अब कभी माता-पिता के बारे में सोचता हूं, तो लगता है, वे जहां भी होंगे, मुझे देखकर खुश जरूर होंगे कि मैं मानवता के कर्म में लगा हूं। मुझे तो कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं अपने हाथों से चल रहा हूं। जब परिक्रमा करता हूं, तो महसूस होता है, जैसे मां मेरी की उंगली पकड़कर अपने साथ लेकर जा रही हैं। रोजाना तड़के 3 बजे से शुरू होती है दिनचर्या
धरमपुरी महाराज ने बताया कि रोजाना तड़के तीन बजे से दिनचर्या शुरू हो जाती है। स्नान के बाद भगवान के लिए प्रसाद तैयार करते हैं। फिर उनको पूजन के लिए जगाते हैं। सर्दी है, इसलिए सुबह 9-10 बजे के बीच परिक्रमा शुरू करते हैं। इससे पहले जो लोग आते हैं, उनसे मिलना होता है। एक दिन में दो-ढाई किलोमीटर परिक्रमा करते हैं। कहीं-कहीं एक-दो दिन विश्राम कर लेते हैं। मां का आशीर्वाद है कि न हाथों में छाले है और न शरीर में दर्द। साथी जहां टेंट लगा देते हैं, वहीं विश्राम कर लेते हैं। पैरों की जगह हाथों के सहारे चलने की बात पर धरमपुरी महाराज बिना कुछ सोचते हुए कहते हैं- गुरुजी का आदेश हुआ कि मुझे अधोमुखी परिक्रमा करनी है। फिर क्या था, विजयादशमी पर अमरकंटक में मां नर्मदा के उद्गम स्थल माई की बगिया से शुरू कर दी परिक्रमा। महाराज कुछ और कहना चाहते थे, इतने में ही वहां मौजूद उनके गुरु शंकरपुरी महराज कहते हैं कि शिष्य तो भोलेनाथ की कृपा से मिला है। वे रामायण के अयोध्या कांड की चौपाई…सुनाते हैं… सिर भर जाउं उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा॥ देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।। चौपाई का अर्थ समझाते हुए शंकरपुरी महाराज कहते हैं, वनवास के दौरान भरत कहते हैं कि जिस मार्ग से भगवान राम, माता जानकी के साथ पैदल चले हों, उस मार्ग पर जूते पहनकर नहीं जा सकता। मुझे तो सिर के बल जाना चाहिए। उनकी बात सुनकर वहां मौजूद लोग प्रशंसा करने लगे। इसी भाव के साथ मैंने शिष्य से पूछा, तो वह तैयार हो गया। मैं उसका साथ देने आ जाता हूं। परिक्रमा पूरी करने में 12 साल लगेंगे। गर्मी में थोड़ा सुबह जल्दी परिक्रमा शुरू होगी। बारिश में चातुर्मास काटना ही होता है। साइंटिस्ट बोले- नर्मदा परिक्रमा में धर्मरूपी विज्ञान की अनुभूति
संत योगेश कटारे भी मौजूद थे। वे धरमपुरी महाराज के शिष्य के अलावा साइंटिस्ट भी हैं। सागर की हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से फार्मेसी के टॉपर रहे हैं। जेएनयू दिल्ली से पीएचडी की। अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी रिसर्च के लिए गए। कनाडा के टोरंटो में पढ़ाई की। भोपाल में बीएनएस काॅलेज में प्रोफेसर भी रहे। योगेश कहते हैं- मैं तो तीन महीने के लिए विदेश से मां नर्मदा पर शोध के लिए आया था। छह महीने होते-होते तीन साल हो गए। मैंने कैसे इन्हें अपना गुरु बनाया, ये मां नर्मदा की कृपा है, लेकिन ये तपस्या ऐसी है कि किसी युग में नहीं की गई। ये परिक्रमा नहीं, बल्कि शोध है। जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, इसे महसूस भी कर रहे हैं। हमें लगता है कि हमारे आगे मां चल रही हैं। वे ही रास्ता दिखा रही हैं। हमारा धर्म एक विज्ञान है। इस धर्मरूपी विज्ञान की अनुभूति मां नर्मदा की परिक्रमा में होती है। यात्रा पूरी होने के बाद भोजन के नाम पर गुरुजी सिर्फ एक रोटी, दाल और एक गिलास दूध पीते हैं। 4 लोगों के हाथ में नर्मदा परिक्रम का कमान
जब से परिक्रमा शुरू हुई है, सुमन गिरि, हनुमान गिरि, तपस्या पुरी, प्रदीप पुरी साथ में हैं। यात्रा के दौरान प्रदीप पुरी के हाथों में कमंडल रहता है, जिसमें धूपबत्ती जलती रहती है। तपस्या पुरी हाथ में गद्दा लेकर चलते हैं, जहां रुकना हुआ, सड़क पर गद्दा लगा देते हैं। सुमन गिरि प्रसाद बांटते हुए चलते हैं। हनुमान गिरि के पास भोजन और टेंट की व्यवस्था का जिम्मा है। जिस रास्ते से परिक्रमा कर रहे, वहां उत्सव का माहौल
धरमपुरी महाराज जिस रास्ते से परिक्रमा कर रहे हैं, वहां उत्सव का माहौल है। ग्रामीण अपने गांव के पास घंटों उनका इंतजार करते हैं। महिलाएं सड़क किनारे भजन गाती रहती हैं। जब महाराज विश्राम के लिए रुकते हैं, वैसे ही आशीर्वाद लेने लोगों की भीड़ लग जाती है। डिंडौरी के संतोष रजक बताते हैं कि तीन महीने से जब से संत की परिक्रमा देखी है, मन प्रसन्न है। दुर्लभ संत होते हैं, जो नर्मदा परिक्रमा मानव कल्याण के लिए करते हैं। इनकी कठिन तपस्या देखने की जब इच्छा होती है, चले आते हैं देखने के लिए। हम धरमपुरी महाराज से बात करने सुबह करीब पौने सात बजे यहां पहुंचे थे। बात करते-करते साढ़े आठ बज गए। टेंट के बाहर अच्छी-खासी भीड़ जमा हो चुकी थी, तभी धर्मपुरी महाराज उठकर बाहर आ गए। लोग उनका आशीर्वाद लेने लगे। साढ़े नौ बजे तक वे लोगों से मिलते रहे। फिर कुछ देर के लिए टेंट में चले गए। ऐसे शुरू होती है यात्रा यात्रा पूरी होने से पहले लग जाता है टेंट
टेंट और भोजन की व्यवस्था देख रहे हनुमान गिरि महाराज यात्रा शुरू होने के बाद सामान समेटना शुरू कर देते हैं। वे श्रद्धालुओं के साथ सामान लेकर अगले पड़ाव की ओर रवाना हो जाते हैं। सुविधाजनक जगह देखकर अपने साथियों के लिए तुरंत टेंट लगाकर भोजन और पूजन-पाठ की तैयारी करते हैं। जैसे ही, धरमपुरी महाराज यात्रा को विराम दे टेंट में पहुंचते हैं। सबसे पहले मां नर्मदा का ध्यान करते हैं। फिर लोगों से मिलते हैं। जाहान हूरलिंगर के नाम हैंड वॉकिंग का रिकॉर्ड
जानकारी के अनुसार हैंड वॉकिंग का सबसे लंबा रिकॉर्ड सारा चैंप मैंन (UK) ने आठ घंटे में 5, हजार मीटर (3.1 मील) की दूरी वर्ष 2002, में की थी, जबकि जाहान हुरलिंगर (ऑस्ट्रिया) ने सन् 1900 में 1400 किलोमीटर (870 मील) की दूरी तय कर रिकॉर्ड बनाया था। नर्मदा परिक्रमा: हजारों वर्षों की परंपरा
‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ पुस्तक के लेखक अमृतलाल वेगड़ लिखते हैं कि पूर्णिमा के दिन अमरकंटक से निकली मां नर्मदा में महिलाएं दीप प्रज्वलित कर नदी में अर्पित कर रही थीं। यह देखकर अमृतलाल जी ने भी एक महिला से दीप मांग लिया। मां नर्मदा में प्रवाहित किया। उन्होंने बहते हुए दीप को देख मां नर्मदा से प्रार्थना की- “मैया, एक दीप मैं तुम्हारे लिए जला रहा हूं, एक दीप तुम मेरे भीतर जलाना, क्योंकि अंदर बहुत अंधेरा है। वहां का दीप जल नहीं पा रहा है। इस वजह से अंदर से प्रकाश नहीं आ पा रहा।” शायद, यही वजह रही होगी कि ऋषि मार्कंडेय ने अपने भीतर के प्रकाश को प्रज्ज्वलित करने के लिए मां नर्मदा की परिक्रमा की थी। स्कंद पुराण, शिव पुराण और अन्य हिंदू ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि नर्मदा परिक्रमा करने वाले प्रथम व्यक्ति ऋषि मार्कंडेय थे। उन्होंने नर्मदा के दोनों तटों पर स्थित करीब 999 सहायक नदियों को बिना पार किए, प्रत्येक नदी के स्रोत की परिक्रमा करते हुए यह यात्रा पूरी की। इसमें उन्हें 45 साल लगे थे। दुनिया की एकमात्र नदी, जिसकी परिक्रमा की जाती है
दुनिया में नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। मां नर्मदा की यात्रा अमरकंटक से उसके संगम स्थल खंभात की खाड़ी तक पैदल की जाती है। देव उठनी एकादशी के बाद यदि साधक परिक्रमा शुरू करता है, तो पैदल यात्रा में तीन साल, तीन महीने और 13 दिन लगते हैं। श्रद्धालु इस यात्रा में नर्मदा को दाहिनी ओर रखते चलते हैं। परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले आश्रमों, मंदिरों और गांवों में रुकते हैं। अमरकंटक से निकलकर अरब सागर में समा जाती है
नर्मदा को ‘रेवा’ भी कहते हैं, मध्य भारत की प्रमुख जीवनदायिनी नदी है। इसका उद्गम स्थल अनूपपुर जिले में स्थित अमरकंटक है, जो समुद्र तल से 1,057 मीटर की ऊंचाई पर है। अमरकंटक को ‘तीर्थों का मुकुटमणि’ भी कहते हैं, क्योंकि यहां से नर्मदा के अलावा सोन और जोहिला नदियां भी निकलती हैं। एकमात्र प्रमुख नदी जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है
नर्मदा की कुल लंबाई करीब 1,312 किलोमीटर है। यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर बहती हुई गुजरात के भरूच जिले के पास खंभात की खाड़ी में अरब सागर में मिलती है। यह भारत की एकमात्र प्रमुख नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। मां नर्मदा अमरकंटक से निकलकर जबलपुर, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर, महेश्वर और भरूच जैसे महत्वपूर्ण स्थलों से होकर गुजरती है। यात्रा आध्यात्मिक साधना को जगाने के लिए भी की जाती है
नर्मदा परिक्रमा सिर्फ आस्था और श्रद्धा के लिए नहीं की जाती, बल्कि यह यात्रा आध्यात्मिक साधना को जगाने के लिए भी की जाती है। मान्यताओं के अनुसार नर्मदा शिव के पसीने से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए इन्हें गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है। इतिहास के मुताबिक सतपुड़ा और विंध्याचल गंगोत्री से भी पहले अस्तित्व में आए थे, जिसके अनुसार मां नर्मदा का जन्म गंगा से पहले हुआ। शास्त्रों के अनुसार, यह तपस्या का स्वरूप है, जिसमें परिक्रमार्थी सांसारिक मोह से दूर रहकर केवल मां नर्मदा की शरण में होते हैं। भूमि पर विश्राम, भिक्षा पर निर्वाह और पैदल यात्रा इसमें अनिवार्य मानी जाती है। स्कंद और शिव पुराण में नर्मदा को मोक्षदायिनी कहा गया है। मत्स्य पुराण में वर्णन है कि नर्मदा के दर्शन और जल स्पर्श मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। यह यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि का मार्ग भी है।

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