हीमोफीलिया मरीजों को बड़ी राहत:एमिसिजुमैब दवा से रुका खून बहना, इंजेक्शन महीने में सिर्फ एक बार ही लगेगा

थक्का नहीं बनने से खून नहीं रुकने की बीमारी हीमोफीलिया के मरीजों के लिए एमबी के बाल चिकित्सालय में नई दवा एमिसिजुमैब उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है। यह इंजेक्शन लगने के बाद मरीजों को ब्लीडिंग नहीं हो रही है। शुरुआत को एक महीना हो चुका है। अस्पताल में पंजीकृत 236 में से 18 मरीजों को यह दवा देने के बाद किसी को भी अंदरूनी रक्त स्राव नहीं हुआ। ये वही रोगी हैं, जिन्हें महीने में औसतन 6-7 बार ब्लीडिंग होने पर नसों में बार-बार फैक्टर-8 इंजेक्शन लगवाना पड़ता था। एमिसिजुमैब दवा से समस्या कम हुई है। खास बात ये कि इसकी 150 मिलीग्राम की कीमत करीब 2 लाख रुपए है, जो प्रदेश में अभी सिर्फ एमबी अस्पताल में निशुल्क दी जा रही है। बता दें, संभाग में इस रोग के 800 मरीज हैं। हीमोफीलिया का दुनिया में स्थायी इलाज नहीं है। दवा लेने के बाद किसी मरीज को अंदरूनी रक्त स्राव नहीं केस 1 : सिरोही के मोइन को पहले महीने में 8-10 बार ब्लीडिंग होती थी। एक जगह खून इकट्ठा होने पर सूजन आ जाती थी। नई दवा देने के बाद एक बार भी यह परेशानी नहीं हुई। केस 2 : तीन साल के हेमेंद्र का हाथ खेलते-खेलते चरखे में चला गया। मामूली खून बहने के बाद बंद हो गया है। केस 3 : 10 साल के माहिर को पहले दांत टूटने पर 5 दिन तक खून बहता था। अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता था। इस बार 5 मिनट में बंद हो गया। केस 4 : भीलवाड़ा के पीयूष दिव्यांग हैं। माह में 6-7 बार व्हीलचेयर पर भीलवाड़ा से उदयपुर आना पड़ता था। फरवरी में दवाई देने के बाद अभी तक दिक्कत नहीं। इंसुलिन की तरह इस्तेमाल, घर बैठे लगा सकते हैं बाल रोग विभाग की रेजिडेंट डॉ. हिमानी डेंडोर ने बताया कि एमिसिजुमैब मोनोक्लोनल एंटीबॉडी है, जो फैक्टर-8 की तरह काम करती है। यह दवा महीने में एक बार त्वचा के नीचे दी जाती है। मरीज इसे घर पर खुद भी ले सकते हैं। गत 4 फरवरी से इसे एमबी के हीमोफीलिया मरीजों को देना शुरू किया था। विभाग अध्यक्ष डॉ. आरएल सुमन ने बताया कि एमिसिजुमैब प्रोफिलैक्सिस देने के बाद किसी भी रोगी में ब्लीडिंग नहीं हुई है। अब माह में एक बार ही अस्पताल आना पड़ेगा। ये फायदे : कम हुई पेचीदगियां, बार-बार भर्ती का झंझट भी नहीं फेक्टर 8 को नसों के अंदर दिया जाता है। यह चिकित्सक से ही लगवाना पड़ता था। मरीज को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। नई दवाई इंसुलिन की तरह है। इसे पेशेंट खुद भी लगा सकते हैं। मरीज को एक माह में ही 7-8 बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। अब सिर्फ एक बार यह दवाई लगवाने के लिए आना है। इसके परिणाम सकारात्मक हैं। मरीज को इंटरनल ब्लीडिंग नहीं हो रही है। बार-बार एक ही दवाई देने से कुछ मरीजों में इनहिबिटर बनने से इलाज और मुश्किल हो गया था। यानी उनकी बॉडी पर दवाई का असर नहीं हो रहा था। नई दवाई से उन्हें राहत मिली है।

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