आमतौर पर लोग हे फीवर यानी एलर्जिक राइनाइटिस को “मौसमी एलर्जी” मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह बीमारी सालों तक पीछा नहीं छोड़ती। अब एम्स भोपाल के एक बड़े क्लिनिकल अध्ययन ने इस बीमारी को लेकर ऐसी बात सामने रखी है, जो इलाज की दिशा बदल सकती है। अध्ययन में दावा किया गया है कि अगर पारंपरिक एलोपैथिक इलाज के साथ होम्योपैथी जोड़ी जाए, तो हे फीवर के लक्षण न सिर्फ तेजी से कंट्रोल होते हैं, बल्कि दवा बंद करने के बाद भी लंबे समय तक वापस नहीं आते। यह स्टडी अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुई है और इसके नतीजे चौंकाने वाले हैं। एम्स भोपाल में किया गया यह अध्ययन इसलिए अहम है क्योंकि यह सिर्फ अनुभव या दावा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से किया गया क्लिनिकल ट्रायल है। यह रैंडमाइज्ड, ओपन-लेबल कंट्रोल्ड स्टडी एम्स भोपाल के आयुष (होम्योपैथी) विभाग और ईएनटी विभाग के संयुक्त सहयोग से की गई। इस अध्ययन का नेतृत्व डॉ. आशीष कुमार दीक्षित (होम्योपैथी) और डॉ. अंजन कुमार साहू (ईएनटी) ने किया। रिसर्च टीम में डॉ. शैला और डॉ. निभा गिरी भी शामिल रहीं। 210 मरीज, दो ग्रुप और 18 हफ्ते का फॉलोअप
स्टडी में मध्यम से गंभीर एलर्जिक राइनाइटिस से पीड़ित 210 वयस्क मरीजों को शामिल किया गया। मरीजों को दो ग्रुप में बांटा गया। पहले ग्रुप को सिर्फ मानक एलोपैथिक इलाज यानी फ्लुटिकासोन फ्यूरोएट नेजल स्प्रे दिया गया। दूसरे ग्रुप को वही मानक इलाज दिया गया, लेकिन उसके साथ मरीज की प्रकृति के अनुसार व्यक्तिगत होम्योपैथिक दवाएं भी दी गईं। इलाज 12 हफ्तों तक चला और इसके बाद 6 हफ्ते तक मरीजों को बिना दवा के सिर्फ ऑब्जर्व किया गया। रिसर्च में यह बात सामने आई कि इलाज के शुरुआती चरण में यानी 4 और 12 सप्ताह के बाद दोनों ग्रुप में लगभग समान सुधार देखा गया। इसका मतलब यह कि एलोपैथिक दवा से तत्काल राहत मिली, लेकिन असली फर्क 18वें हफ्ते में सामने आया, जब दवा बंद किए हुए 6 हफ्ते हो चुके थे। 18 हफ्ते बाद के नतीजे
जिन मरीजों ने मानक इलाज (SOC) के साथ होम्योपैथी ली थी, उनका टोटल नेजल सिम्पटम स्कोर (TNSS) औसतन 1.44 पाया गया। वहीं, सिर्फ मानक इलाज लेने वाले मरीजों में यह स्कोर 6.48 था। यानी होम्योपैथी ग्रुप में नाक से जुड़े लक्षणों में लगभग 78% ज्यादा कमी देखी गई। सिर्फ लक्षण ही नहीं, बल्कि मरीजों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी इसका असर देखा गया। होम्योपैथी ग्रुप में क्वालिटी ऑफ लाइफ स्कोर 0.88 रहा, जबकि केवल मानक इलाज वाले ग्रुप में यह 2.24 था। इसका मतलब यह हुआ कि जिन मरीजों को होम्योपैथी मिली, उनकी जीवन गुणवत्ता में लगभग 61% ज्यादा सुधार दर्ज किया गया। शोध से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन इस धारणा को मजबूती देता है कि एलर्जिक राइनाइटिस जैसे क्रॉनिक रोगों में इंटीग्रेटेड अप्रोच ज्यादा असरदार हो सकती है। यानी एलोपैथी और होम्योपैथी को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक मानकर देखा जाए। क्या है हे फीवर, जिससे हर दूसरा घर परेशान
एलर्जिक राइनाइटिस, जिसे आम भाषा में हे फीवर कहा जाता है, आज की लाइफस्टाइल की सबसे आम बीमारियों में से एक बन चुकी है। धूल, पराग, पालतू जानवरों की रूसी, फफूंद और प्रदूषण जैसे एलर्जेंस के संपर्क में आते ही शरीर की इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने लगती है। नतीजा—बार-बार छींक, नाक बहना या बंद होना, आंखों से पानी, गले में खुजली, थकान और सिरदर्द। कई मरीजों में नींद खराब हो जाती है और कामकाज पर असर पड़ता है। डॉक्टरों के मुताबिक, एलर्जिक राइनाइटिस में समस्या यह है कि दवाएं लक्षण दबा तो देती हैं, लेकिन दवा बंद होते ही परेशानी फिर शुरू हो जाती है। स्टडी के नतीजे बताते हैं कि होम्योपैथी को सहायक इलाज के तौर पर जोड़ने से लक्षणों की पुनरावृत्ति कम हो सकती है। हे फीवर के लक्षण बचाव और इलाज में क्या करें बदल सकती है इलाज की सोच
एम्स भोपाल की यह स्टडी संकेत देती है कि हे फीवर को सिर्फ “मौसमी एलर्जी” मानकर छोड़ देना सही नहीं। सही और समग्र इलाज से न सिर्फ लक्षण कंट्रोल किए जा सकते हैं, बल्कि लंबे समय तक राहत भी मिल सकती है। यह रिसर्च आने वाले समय में एलर्जिक राइनाइटिस के इलाज को लेकर नई बहस और नई दिशा तय कर सकता है। स्टडी का आधार


