उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में एक अनूठी परंपरा है। देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल यहीं प्रतिदिन सुबह भगवान महाकाल का भस्म से श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद भस्म आरती की जाती है। श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के महंत विनीत गिरी महाराज के अनुसार, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। भस्म श्रृंगार के पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण हैं। एक प्रमुख मान्यता माता सती से जुड़ी है। जब माता सती ने अग्नि में प्रवेश किया, तब भगवान शिव ने उनकी चिता की भस्म को अपने पूरे शरीर पर लगाया। भस्म को वस्त्र की तरह धारण करने की परंपरा नागा संन्यासियों में भी देखी जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से भस्म को इस संसार का अंतिम सत्य माना जाता है। हर वस्तु का अंतिम रूप भस्म ही होता है। श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म अर्पण की यह विशेष जिम्मेदारी परंपरागत रूप से श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा निभा रहा है। यह अनूठी परंपरा महाकाल मंदिर की विशिष्ट पहचान है। भस्म को वैराग्य का प्रतीक माना गया महंत श्री ने कहा कि भस्म को वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। कारण है कि हम श्मशान में जब जाते है तो मनुष्य शरीर की भी अंतिम गति होती है। वह भस्म हो जाता है। कोई भी पदार्थ हो मेटल हो कुछ भी हो प्रत्येक की जो अंतिम अवस्था है शाश्वत अवस्था है। वह भस्म है। जो सत्य को धारण करता है वही शिव कहलाता है। सत्य से भगवान श्रृंगार करते हैं, और भगवान का श्रृंगार भी भस्म से ही माना गया है। काल के देवता है। इनका नाम महाकाल है। मतलब समय के देवता तो समय की भी अंतिम परिणीति भस्म है। शाश्वत सत्य को जो धारण करता है वही शिव कहलाता है। इस काल की अंतिम परिणीत को जो धारण करता है वही महाकाल कहलाता है। इसलिए महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। परंपरा से अखाड़ा महंत अर्पित करते है भस्म भस्म अर्पित करने की जो परंपरा है उसमें पूर्व काल से श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के जो महंत जिनकी नियुक्ति इस स्थान में होती है उनके माध्यम से की जाती है। वही परंपरा आज भी भगवान महाकाल के प्रांगण में चली आ रही है। नित्य जो भस्म आरती और भस्म श्रृंगार के पारंपरिक अवस्था है। वह सिर्फ और सिर्फ महाकाल में है। भस्म के लिए अखंड धूनी प्रज्ज्वलित रहती है श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर स्थित श्री ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे अखंड धूनी प्रज्ज्वलित रहती है। यहां गाय के उपलों से भस्म के लिए धूनी प्रज्ज्वलित की जाती है। अखाड़े के प्रतिनिधि नित्य प्रतिदिन बाबा महाकाल के लिए भस्म तैयार करते है। इसके लिए उपलों से तैयार भस्म को दो से तीन बार बारिक महिन कपड़े से छानकर भगवान को अर्पित होने वाली भस्म तैयार की जाती है। धुनी में केवल अखाड़ा प्रतिनिधि ही जाते है। अन्य किसी को जाने की अनुमति नही होती।


