15893 सैंपल की जांच; खेतों की मिट्‌टी में पोषक तत्व नाइट्रोजन, जिंक व आयरन की हो रही कमी

आज शुक्रवार को मृदा दिवस मनाया जाएगा। इसको लेकर भास्कर ने जिले के खेतों की मिट्‌टी में पोषक तत्वों के बारे में जानकारी जुटाई। सामने आया कि मिट्‌टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा कम हो रही है। इसके साथ ही सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी कमी आने लगी है। जिले में खरीफ सीजन में विभाग द्वारा एकत्रित किए गए मृदा के 15893 सैंपलों की जांच रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। मिट्‌टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का मुख्य कारण किसानों द्वारा पोषक तत्वों की तरफ ज्यादा ध्यान देना भी माना जा रहा है। जिला मुख्यालय पर संचालित मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की प्रभारी कविता बुडानिया ने बताया कि खरीफ की बुवाई से पहले मिट्‌टी के 15 हजार से अधिक सैंपल लेकर मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण का लक्ष्य रखा गया था। विभिन्न ग्राम पंचायतों से मिट्‌टी के 15893 सैंपलों की जांच चूरू व तारानगर प्रयोगशाला में की गई। उनका परीक्षण किए जाने पर सामने आया कि मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन की जिले की मिट्‌टी में कमी पाई गई है। फास्फोरस की मात्रा भी कम व मध्यम मात्रा और पोटेशियम मध्यम व अधिक मात्रा में आया है। इसी तरह सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक और आयरन की मात्रा भी काफी कम पाई गई है। फसलों के अच्छे और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए खेत की मिट्‌टी में जरूरी पोषक तत्वों का होना जरूरी होता है। मिट्‌टी की जांच करवाने से किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के जरिए पोषक तत्वों की उपलब्धता व कमी के बारे में पता चल रहा है। इसके साथ ही उनको पर्याप्त मात्रा में खाद व उर्वरकों का उपयोग किए जाने की भी जानकारी मिल जाती है। जिले में अधिकतर किसान यूरिया आदि का अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग नहीं करते। लंबे समय से इन सूक्ष्म पोषक तत्वों का पर्याप्त रूप से उपयोग नहीं किए जाने के चलते धीरे-धीरे मिट्‌टी में इन पोषक तत्वों की कमी आती जा रही है। जिला मृदा परीक्षण प्रयोगशाला प्रभारी कविता बुडानिया के अनुसार फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मिट्‌टी में पोषक तत्वों की मात्रा भी पर्याप्त रूप में होना जरूरी है। पोषक तत्वों की कमी होने पर फसल जलने व ग्रोथ कम होने की समस्या हो जाती है। सूक्ष्म पोषक तत्व शामिल पोषक तत्वों के समन्वित प्रयोग से मृदा उर्वरता व फसल उत्पादकता में बढ़ोतरी की जा सकती है। किसानों को सबसे पहले अपनी मिट्टी की जांच करवानी चाहिए और मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों के अनुसार ही खाद का उपयोग करना चाहिए।

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