ज्योति आज जिंदा है, बेटे के साथ खड़ी है, उसके पीछे सुरेंद्र का बहुत बड़ा योगदान है। मानवता के रिश्ते की यह कहानी 2007 की है। ज्योति के भाई संजय जोशी (संजू) हॉस्पिटल में अपनी बहन के लिए रो रहे हैं। यहां से वहां खून के बंदोबस्त के लिए भाग रहे हैं। मौत से जूझ रही ज्योति को 35 यूनिट तक खून की तुरंत जरूरत है, लेकिन किसी ब्लड बैंक में इतना खून नहीं था। तभी, सुरेंद्र की नजर संजू पर पड़ी। पूछा तो तुरंत अपना ब्लड दिया और राजस्थान विश्वविद्यालय से अपने 40 दोस्तों को बुलाकर सबसे खून दिलवाया। आज 17 साल बाद ज्योति बेटे आदित्य के साथ सुरेंद्र से मिल रही है। आदित्य पहली बार सुरेंद्र से मिल रहा है, मां और अपने होने पर सुरेंद्र के प्रति कृतज्ञ है। ज्योति के पति मनीष बताते हैं- 23 अप्रैल 2007 की बात है। जयपुर के निजी हॉस्पिटल में ज्योति एडमिट थी। डिलीवरी पीरियड में ज्योति की तबीयत तेजी से बिगड़ी। डिलीवरी के बाद यूट्रस फटने से बेतहाशा खून बह गया। डॉक्टरों ने पोस्ट प्रेंग्नेंसी हेमरेज (पीपीएम) बताते हुए तुरंत 30 से 35 यूनिट ब्लड की जरूरत बताई। एक-एक पल मुश्किल था। एसएमएस सहित शहर के सभी ब्लड बैंक ने हाथ खड़े कर दिए। संजू को रोता देख सुरेंद्र भोजक आए, वजह पूछी। यूनिवर्सिटी से लॉ कर रहे सुरेंद्र ने हिम्मत बंधाई। खुद ने खून दिया। इस दौरान ज्योति आईसीयू से वेंटिलेटर पर पहुंच गई थी। सुरेंद्र ने हॉस्टल सहित यूनिवर्सिटी के तमाम दोस्तों को फोन किए। कुछ ही देर में सुरेंद्र के 40 दोस्त हॉस्पिटल में थे। सभी ने एक-एक कर ब्लड डोनेट किया। करीब पांच दिन क्रिटिकल रहने के बाद ज्योति जी उठी। उसी डिलीवरी में आदित्य हुआ। वो मां के साथ सुरेंद्र को देख रहा है। बोला- तब आप ना होते तो ना मां होती और ना ही मैं। सुरेंद्र बोले- मैंने और दोस्तों ने वही किया जो सबको ऐसे वक्त में करना ही चाहिए। उस घटना से प्रेरणा लेकर पिता की पुष्यतिथि पर हर साल रक्तदान शिविर लगाते हैं। 23 अप्रैल 2007; ज्योति की जान खतरे में थी, सुरेंद्र वक्त पर मददगार बने। 3 अक्टूबर 2025; ज्योति आभार जताने अपने बेटे के साथ सुरेंद्र से मिलने आई।


