राजस्थान सरकार का बजट 19 फरवरी को पेश किया जाने वाला है। लोगों को इस बजट से बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन हालात ये हैं कि राज्य पर कुल कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 37.48 फीसदी पहुंच चुका है। हालांकि इसकी सीमा जीडीपी का 40% ही है। 10 साल पहले यह 18% से भी कम था। दूसरी ओर, सरकार हर साल टैक्स से होने वाली आय से ज्यादा सैलरी, पेंशन, कर्ज के ब्याज और मुफ्त योजनाओं पर खर्च कर रही है। पिछले साल ही विभिन्न तरह के टैक्स से 2.64 लाख करोड़ रु. राजस्व मिला था। जबकि, 2.90 लाख करोड़ रु. तो सैलरी, पेंशन, ब्याज और मुफ्त योजनाओं पर ही खर्च हो गए। ऐसे में राज्य सरकार के पास विकास कार्यों के लिए कुछ भी बचा ही नहीं। राजस्व के मुकाबले खर्च 25,758 करोड़ रु. ज्यादा और हो गया। यानी आय से ज्यादा खर्च के कारण बजट लगातार घाटे का ही रहा है। इस कारण से विकास की सारी योजनाओं, भवन, लैब और इंस्टीट्यूट जैसे अन्य काम करने के लिए सरकार को भारी कर्ज लेना पड़ रहा है। हालत यह है कि हर साल यह कर्ज बढ़ता जा रहा है। मतलब ये है कि विकास का घी पीने के लिए कर्ज ही एकमात्र सहारा है। कर्ज नहीं लें तो बजट में विकास की एक भी घोषणा पूरी कर पाना संभव ही नहीं है। पिछले साल भी कुल 2.31 लाख करोड़ रु. का कर्ज लिया गया, जिनमें से 1.60 लाख करोड़ रु. के कर्ज साल खत्म होने से पहले चुका दिए। इस कारण पिछले एक साल का लिया गया कर्ज 70,151.72 करोड़ रुपए दिखाया गया। मैन्यूफैक्चरिंग पर सरकार अपना खर्च बढ़ाए, निवेशकों को सुविधाएं मिले
“सरकार के वित्तीय अनुमानों और वास्तविक व्यय के अध्ययन से साफ है कि वेतन,पेंशन एवं सामाजिक सुरक्षा पर खर्च 45 प्रतिशत से है। कर राजस्व भी हर सरकार में पार्टी की प्राथमिकताओं के अनुसार बदलता है। सार्वजनिक उपयोगिता के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना सरकार का दायित्व है। इसके लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है। इसके लिए इनक्लूसिव ग्रोथ हो। मैन्यूफैक्चरिंग पर सरकार अपना खर्चा बढ़ाए और इंसेंटिव आफर करके प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा दे।”
-डाॅ. अंशु भारद्वाज, अर्थशास्त्री, राजस्थान यूनिवर्सिटी


