रांची यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. अजीत कुमार सिन्हा ने कहा कि लेक्चरर बनने और करियर में प्रमोशन के लिए स्कॉलर पीएचडी कर रहे हैं। यह बड़ी ट्रेजडी (त्रासदी) है। पीएचडी की डिग्री अवार्ड होते ही रिसर्च वहीं पर रुक जाता है। रिसर्च इंड (अंत) तक नहीं पहुंचता। इस कारण अभ्यर्थियों द्वारा किए जा रहे रिसर्च का लाभ सोसाइटी को नहीं मिल पाया है। वे सोमवार को रांची यूनिवर्सिटी पीजी फिलॉस्फी विभाग की ओर से भारतीय दर्शन परिषद के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार के समापन समारोह में बोल रहे थे। इसका विषय जनजातीय जीवन दर्शन था। वीसी डॉ. सिन्हा ने कहा कि रिसर्च को निष्कर्ष तक नहीं ले जाना दुखद है। बेहतर रिसर्च के लिए लोगों के बीच जाना होगा। उन्होंने कहा कि अधिवेशन में 700 से अधिक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए गए हैं। इसमें से बेहतर रिसर्च पेपर का चयन कर रिसर्च को आगे बढ़ाया जा सकता है। विश्व दर्शन परिषद चाहे तो सभी रिसर्च पेपर को किताब के रुप में रांची यूनिवर्सिटी प्रकाशित करा सकता है। लेकिन रांची से बाहर प्रकाशित होने की स्थिति में आर्थिक सहयोग करने में विवि असमर्थ है। क्योंकि आरयू के अंतर्गत फिलॉस्फी की तरह 30 रेगुलर विभाग हैं। इसके अलावा 27 वोकेशनल विभाग हैं। सभी को रांची से बाहर रिसर्च पेपर की किताब प्रकाशित करा पाना संभव नहीं है। इससे पहले अतिथियों का स्वागत एचओडी सह आयोजन सचिव डॉ. अजय कुमार सिंह ने किया। सह सचिव स्मिता मिंज ने धन्यवाद ज्ञापन किया। एसी में रहकर बुक नहीं लिखी जा सकती कुलपति डॉ. अजीत कुमार सिन्हा ने कहा कि सेमिनार का विषय जनजातीय जीवन दर्शन है। इस विषय पर एयर कंडिशन (एसी) में रहकर किताब नहीं लिखी जा सकती है। इसके लिए जनजातीय समुदाय के लोगों के बीच जाना होगा, ठहरना होगा। तब ही आपके रिसर्च से समाज को लाभ मिल सकता है। स्कॉलर जनजातीय लोगों के बीच जाएं और ट्राइबल सोसायटी से संबंधित डॉक्यूमेंट तैयार करें। इसमें विवि प्रशासन हर संभव सहयोग करेगा।


