रांची नगर निगम बनने से पहले रांची में दो नगर निकाय और एक वाटर बोर्ड हुआ करता था। तीनों के क्षेत्र अलग-अलग थे और काम भी अलग-अलग। उस समय शहरी विकास के नाम पर न तो कोई जिम्मेदार था और न ही कोई योजना ही थी। पहली बार रांची में तीसरी सरकार (नगर निकाय का चुनाव) का गठन 64 साल पहले वर्ष 1964 में हुआ था। उस समय मेरे दादाजी शिव नारायण जायसवाल चुनाव जीतकर रांची के पहले चेयरमैन (उस समय महापौर नहीं, चेयरमैन का पद हुआ करता था) बने थे। वे पेशे से व्यवसायी थे, लेकिन राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी। राजशाही परिवार से होने के नाते उनके पिता राय बहादुर ठाकुर दास जायसवाल अंग्रेजी शासक के करीबी थे। वे ब्रिटिश सीनेट के सदस्य भी थे। इंडस्ट्रियल एडवाइजर के रूप में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्हें देखकर व्यवसाय के साथ शिव नारायण जायसवाल भी राजनीति में आ गए। महापौर बनने के बाद उन्होंने बताया कि शहरीकरण क्या होता है और यह गांव से कैसे अलग है। वे पूरे 14 वर्षों तक नगर निकाय के चेयरमैन रहे। शिवनारायण जायसवाल ने समाज की समस्याओं को ध्यान में रखकर उसे दूर करने वाली योजनाओं को शहर में उतारना शुरू किया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए, जैसे- शाम ढलते ही सड़कों पर फैलते अंधेरे को देखकर उन्हें स्ट्रीट लाइट लगवाने का विचार आया। पहली बार तब मेन रोड, कोकर रोड सहित अन्य क्षेत्रों में करीब तीन हजार स्ट्रीट लाइटें लगाई गई थीं। मुहल्लों में पीसीसी सड़कों का निर्माण भी उन्होंने शुरू कराया। बच्चों के खेलने के लिए उन्होंने शहर के कचहरी रोड में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का निर्माण कराया। स्टेडियम बनने के बाद उन्हें हरेक उम्र के लोगों के मनोरंजन की चिंता हुई, तो स्टेडियम के सामने ही टाउन हॉल का निर्माण कराया। रांची में पहला सुलभ शौचालय भी उनके ही समय में शुरू हुआ। नीयत साफ हो, तो बदली जा सकती है शहर की तस्वीर: बिहार सरकार के समय वाटर ड्रेनेज सिस्टम को लेकर प्रस्ताव तो पारित हुआ, लेकिन वह पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सका। यदि उस समय यह कार्य पूरा हो गया होता, तो आज बारिश में रांची को जिस जलजमाव की समस्या से जूझना पड़ता है, उससे काफी हद तक राहत मिलती। उस दौर की चुनौतियां भी कम नहीं थीं। तब छोटानागपुर, बिहार का हिस्सा था। सत्ता में बैठे लोग इस क्षेत्र को प्राथमिकता सूची में नहीं रखते थे। स्थानीय समस्याओं को अक्सर नजरअंदाज किया जाता था। फंड की भारी कमी के बावजूद शिव नारायण जायसवाल ने विकास कार्यों की रफ्तार को थमने नहीं दिया। शिव नारायण जायसवाल का कार्यकाल याद दिलाता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद नीयत साफ हो, तो शहर की तस्वीर बदली जा सकती है। अपर बाजार और डेली मार्केट में दुकानें बनवाए गए लोगों को रोजगार करने के लिए व्यवस्थित बाजार हो। इस विचार को धरातल पर उतारने के लिए अपर बाजार में छोटे-छोटे दुकानें बनाकर काफी कम शुल्क पर आवंटित किए गए। मेन रोड में डेली मार्केट का निर्माण कराया गया। नगर निकाय का भवन भी बनवाया, जिसमें अब जुडको का कार्यालय है। ये सभी उस समय के दूरदर्शी फैसले थे। शहर की बुनियादी जरूरतों को समझते हुए उन्होंने बड़ा तालाब का सौंदर्यीकरण कराया। तालाब के चारों ओर हरियाली लाई गई।


