1971 युद्ध: युद्धकालीन ऑफिसर ने सुनाई संघर्ष की कहानी:साहसी सैनिकों ने पाक टैंकों को भारत में घुसने नहीं दिया, इंजीनियरों ने पुल उड़ाकर फिरोजपुर शहर बचाया

भारतीय सेना आज विजय दिवस मना रही है। इस अवसर पर 1971 के भारत–पाक युद्ध से जुड़ी एक ऐसी वीरगाथा सामने आई है, जो इतिहास के पन्नों में कम दर्ज हुई, लेकिन इसका साहस और बलिदान अतुलनीय रहा। युद्धकालीन अधिकारी कैप्टन विजय सिंह बामणू ने फिरोजपुर सेक्टर के हुसैनीवाला हेड पर लड़े गए भीषण संघर्ष की आंखों देखी कहानी साझा की है। हुसैनीवाला हेड आज शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की स्मारक स्थली तथा बीएसएफ की रिट्रीट सेरेमनी के लिए जाना जाता है। लेकिन नवंबर और दिसंबर 1971 में यही इलाका भारत–पाक युद्ध का एक निर्णायक रणक्षेत्र था। यहां 1965 और 1971 के युद्धों में शहीद हुए वीर सैनिकों के नाम आज भी अंकित हैं। 3 दिसंबर 1971: पश्चिमी सीमा पर एक साथ हमला 3 दिसंबर 1971 की शाम पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा पर हवाई और जमीनी हमले एक साथ शुरू किए। कारगिल से लेकर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान तक युद्ध के कई मोर्चे खुल गए। इसका उद्देश्य भारत की सैन्य तैयारियों को एक साथ कई दिशाओं से चुनौती देना था। हुसैनीवाला रेल-रोड ब्रिज पर पाकिस्तान की बड़ी साजिश फिरोजपुर से करीब 11 किलोमीटर आगे सतलुज नदी पर बने हुसैनीवाला रेल-रोड ब्रिज के जरिए पाकिस्तान ने फिरोजपुर पर कब्जा करने की योजना बनाई। इस हमले में करीब 45 बख्तरबंद टैंक शामिल थे, जो पुल पार कर भारतीय सीमा में घुसने लगे। जैसे ही पाकिस्तानी टैंक पुल पर पहुंचे, भारतीय सेना के इंजीनियरों ने पहले से लगाए गए विस्फोटकों से पुल का अपनी ओर का हिस्सा उड़ा दिया। धमाके के साथ एक पाकिस्तानी टैंक सतलुज नदी में जा गिरा, जबकि बाकी टैंक वहीं फंस गए। इस साहसिक कार्रवाई ने दुश्मन की फिरोजपुर पर कब्जे की योजना को पूरी तरह नाकाम कर दिया। भारतीय तैनाती और भीषण गोलाबारी उस समय क्षेत्र में भारतीय पैदल सेना की 15 पंजाब रेजिमेंट और तोपखाने की 5 फील्ड रेजिमेंट की 48 तोपें तैनात थीं। दोनों ओर से जबरदस्त गोलाबारी हुई, लेकिन पुल टूट जाने के कारण पाकिस्तानी सेना आगे बढ़ने में असफल रही। 8 दिसंबर: सतलुज में पानी छोड़ने का निर्णायक आदेश 8 दिसंबर 1971 को भारतीय उच्च कमान से आदेश मिला कि हुसैनीवाला बैराज के गेट खोलकर सतलुज नदी में पानी छोड़ा जाए, ताकि दुश्मन किसी भी हालत में नदी पार न कर सके। यह एक बेहद जोखिम भरा लेकिन रणनीतिक रूप से जरूरी फैसला था। अंधेरा होते ही इंजीनियर कोर के एक मेजर और एक सूबेदार को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। 5 फील्ड रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल एल.टी. फर्नांडीज को इस पूरे ऑपरेशन की निगरानी का दायित्व दिया गया। उनके साथ आईओ कैप्टन सी.एस. ढिल्लों और रेडियो ऑपरेटर लख सिंह भाटी भी मौजूद थे। भारी फायरिंग में शहादत और घायल ‘टाइगर’ जैसे ही बैराज के गेट खुलने की आवाज आई, दुश्मन ने लाइट फायर की और पुल पर जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी। इस हमले में इंजीनियर कोर के अधिकारी और जेसीओ शहीद हो गए, जबकि लेफ्टिनेंट कर्नल फर्नांडीज गंभीर रूप से घायल हो गए। ‘टाइगर’ को कंधों पर उठाकर बचाई जान रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में कमांडिंग ऑफिसर का कोडवर्ड “टाइगर” होता है। खून से लथपथ घायल ‘टाइगर’ को कैप्टन सी.एस. ढिल्लों और रेडियो ऑपरेटर लख सिंह भाटी ने अपनी जान की परवाह किए बिना कंधों पर उठाया। गोलियों की बारिश के बीच वे उन्हें पुल के पीछे सुरक्षित स्थान तक ले गए। उसी रात लेफ्टिनेंट कर्नल फर्नांडीज को फिरोजपुर एडीएस पहुंचाया गया, जहां ब्लैकआउट के चलते सीमित इलाज संभव था। अगले दिन उन्हें एयरलिफ्ट कर दिल्ली भेजा गया। दिल्ली और बाद में पुणे में तीन बड़े ऑपरेशनों के बाद उनकी जान बच सकी। 9–10 दिसंबर: ममदोट सेक्टर में जवाबी कार्रवाई 9 और 10 दिसंबर 1971 को 5 फील्ड रेजिमेंट को ममदोट (फाजिल्का) सेक्टर भेजा गया। यहां अमरूदवाली, जलोकेधुआं और राजामोतम समेत पाकिस्तान की पांच चौकियों पर कब्जा किया गया। इस अभियान में 15 डोगरा, 13 पंजाब और 3 गार्ड बटालियन की पैदल सेना अग्रिम मोर्चे पर डटी रही। 16 दिसंबर 1971: जीत के साथ एक अधूरी कहानी 16 दिसंबर 1971 को युद्धविराम हुआ और भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके बावजूद एक टीस यह रही कि लेफ्टिनेंट कर्नल एल.टी. फर्नांडीज, कैप्टन सी.एस. ढिल्लों और रेडियो ऑपरेटर लख सिंह भाटी जैसे जांबाजों के लिए कोई गैलेंट्री अवॉर्ड साइटेशन नहीं भेजा गया। हालांकि उनका अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा रेजिमेंटल इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगी।

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