नई पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच बढ़ती दूरी से पूरी दुनिया चिंतित है, लेकिन राजस्थान के दो गांवों रेवत और कलापुरा की तस्वीर उलट है। जालोर जिले के इन गांवों में सरकारी स्कूल के ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चे अपने परिवार और गांव के बुजुर्गों के पास बैठते हैं। घंटों उनसे बातें करते, सवाल पूछते और क्षेत्र के इतिहास के बारे में जानकारी जुटाते हैं। बुजुर्गों की बताई कहानियां नोटबुक में लिखते हैं। कहानियां सुनाते बुजुर्गों के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करते हैं। जब सभी बच्चों की डायरियां स्कूल में इकट्ठी हो जाती हैं, तो उनमें से कॉमन कहानियों को बड़ी पोथी में लिपिबद्ध किया जाता है। 8 साल में 300 बच्चे अपने गांव का इतिहास दर्ज कर चुके हैं। शुरुआत कैसे: शिक्षक संदीप होमवर्क की जगह बच्चों को यही टास्क करने के लिए देते हैं यह अलख राजकीय उच्च माध्यमिक स्कूल रेवत के व्याख्याता संदीप जोशी ने जगाई है। वह कहते हैं- ग्यारहवीं में बच्चे राज्य का और बारहवीं में देश का इतिहास पढ़ते हैं। स्थानीय इतिहास पढ़ने को नहीं मिलता। इसलिए 2018 में दिवाली और गर्मी की छुटि्टयों में ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चों को होमवर्क की बजाय यह टास्क दिया कि बुजुर्गों के पास बैठकर उनसे स्थानीय इतिहास जानें, लिखें। तब से यह क्रम चल रहा है। अब तक लगभग 300 बच्चे अपने बुजुर्गों के बताए अनुसार अपने इलाके का इतिहास लिख चुके हैं। इसमें हजार साल पुरानी कई रोचक बातें भी सामने आई हैं। बड़ा फायदा यह भी हुआ कि बुजुर्ग और बच्चे पास बैठकर जब किस्से-कहानियां सुनते-सुनाते हैं तो दोनों के चेहरों पर चमक होती है। इससे पीढ़ियों के बीच दूरी घट रही है। बच्चों की नॉलेज बढ़ रही है। उन्हें अपने क्षेत्र की पुरानी बातें जानकर गर्व की अनुभूति भी होती है। फायदा क्या… इतिहास का रिजल्ट सुधरा, 3 पीढ़ियों के बीच करीबी बढ़ी प्रिंसिपल छगनपुरी गोस्वामी कहते हैं- इससे बच्चे अपने तत्कालीन शासकों, वंशजों, जातियों, व्यापार आदि के बारे में जान रहे हैं। तीन पीढ़ियों के बीच करीबी बढ़ रही है। इतिहास विषय में पहले बच्चे 60-70% नंबर लाते थे, अब 100% तक ला रहे हैं।


