छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में सक्रिय नक्सली लीडर सतीश उर्फ रूपेश समेत 210 नक्सलियों के सरेंडर के बाद इलाके में अब थोड़ी शांति है। हालांकि, सरकार ने तो इस इलाके को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया है, लेकिन कुछ छिटपुट नक्सली अब भी बचे हुए हैं। अब अबूझमाड़ के ग्रामीणों ने बिना डरे सड़क, बिजली, अस्पताल से लेकर अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग की है। करीब डेढ़ महीने पहले तक इनके लिए विकास की मांग करना सबसे बड़ा गुनाह था। या तो पिटाई होती थी, या सीधे हत्या। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पिछले 25 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि उस इलाके में क्षेत्रीय विधायक पहुंचे हैं। डेढ़ महीने पहले तक MLA को गांव में जाने की इजाजत नहीं थी। वजह नक्सल दहशत थी। इलाका शांत हुआ तो बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी बाइक से इंद्रावती नदी पार कर कोसलनार, मंगनार, तुषवाल और बेंगलुर पंचायत पहुंचे और ग्रामीणों की समस्याएं सुनी। अबूझमाड़ में नक्सल दहशत कम होने के बाद ग्रामीण अपने अधिकारों के लिए क्या मांग रहे हैं इस रिपोर्ट में पढ़िए:- बीजापुर विधानसभा के अंतिम गांव ये गांव दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर जिले की सरहद पर अबूझमाड़ में है। ये चारों बीजापुर विधानसभा के अंतिम गांव हैं। वहीं MLA ने गांव में जन चौपाल लगाई। ग्रामीणों ने अब बिना डरे बेझिझक होकर अपनी मांग रखी। सभी ने एक स्वर में कहा- हमें सड़क, अस्पताल, पुल चाहिए। विकास की मांग उठाने पर नक्सलियों ने पीटा था, हत्या भी हुई दरअसल, करीब डेढ़ महीने पहले तक इंद्रावती नदी के पार बसे गांवों में नक्सलियों का खौफ था। ग्रामीणों की मानें तो कुछ समय पहले सरकार से इंद्रावती नदी पर पुल बनाने की मांग किए थे। इसकी जानकारी नक्सलियों को मिली थी। जिन्होंने मांग की थी उन ग्रामीणों को गांव से उठाया। अगले दिन सुबह गांव में ही इमली पेड़ के नीचे जन अदालत लगाई और विकास की मांग करने वाले सैकड़ों ग्रामीणों के सामने उन्हें बांधकर बेदम पीटा था। ग्रामीणों को जान से मारने की धमकी दी थी। कुछ ग्रामीणों की हत्या भी हुई थी। डर और दहशत की वजह से कभी किसी ग्रामीण ने दोबारा विकास की मांग नहीं उठाई। ग्रामीणों ने श्रमदान कर बनाई कच्ची सड़क जब नक्सलियों की दहशत कम हुई तो करीब सप्ताहभर पहले चारों पंचायत के ग्रामीणों ने मिलकर श्रमदान कर कच्ची सड़क बनाई थी। चलने के लायक रास्ता बनाया। मेड़-खेत को काटकर अपनी राह आसान करने की कोशिश की थी। ग्रामीण सायबो लेकाम कहते हैं कि पहले अंदर वालों की वजह से समस्या का निराकरण नहीं हो पाता था। उनकी वजह से रुकावट थी। लेकिन, अब इलाका थोड़ा शांत हुआ है तो हमने खुद श्रमदान कर सड़क बनाई। जिसके बाद विधायक पहुंचे। महिलाएं बोलीं- हमारे गांव में आज तक कोई नहीं आया मंगनार गांव की महिला शिवकुमारी और सोनमती ठाकुर ने कहा, हम अपनी जान की परवाह किए बगैर वोट डालने जाते थे। लेकिन पिछले 25 सालों से कोई भी अफसर नेता हमारी समस्या को सुनने नहीं आए। गर्भवती महिलाओं और बीमार व्यक्तियों को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस नहीं है। सड़क नहीं है। हमें सारी सुविधाएं चाहिए। MLA विक्रम मंडावी से सीधी बात सवाल- क्या आप बतौर MLA पहली बार अपने विधानसभा क्षेत्र के इन गांवों में आए हैं? जवाब- जी हां, मैं पहली बार आया हूं। यहां मैंने सभी ग्रामीणों से मुलाकात की। उन्होंने अलग-अलग तरह की मुझे अपनी समस्याएं बताई हैं। मेरी कोशिश है कि सबसे पहले सड़क और छोटे-छोटे पुल-पुलिया की मांग पूरी करवाऊंगा, ताकि इनकी राह आसान हो जाए। अस्पताल के लिए CMHO, शिक्षक के लिए DEO समेत अन्य विकास कार्यों के लिए अलग-अलग विभाग के EE को मैंने यहीं बैठकर ग्रामीणों के सामने ही कॉल किया। बातचीत की है। जल्द ही गांव में आकर गांव वालों की समस्याओं का निराकरण करने के लिए निर्देश दिए हैं। सवाल- राज्य गठन के बाद से अब तक कोई MLA यहां क्यों नहीं पहुंच पाए, जबकि यहां के ग्रामीण जान जोखिम में डालकर वोट देते हैं। फिर भी किसी MLA को पहुंचने 25 साल का वक्त कैसे लग गया? जवाब- ये बात सही है कि राज्य गठन को 25 साल हो गए हैं। इसके बाद भी कोई भी MLA यहां तक नहीं पहुंच पाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह इलाका इंद्रावती नदी के दूसरी तरफ है। संवेदनशील क्षेत्र था। लेकिन अब बीजापुर हो या पूरा बस्तर, जन जीवन सामान्य होता जा रहा है। अब मैं यहां पहुंचा हूं। लोगों से बात किया हूं। इन्हें आश्वस्त किया हूं की मैं दोबारा आऊंगा और अफसर भी यहां आएंगे।
नदी पार शिफ्ट होता था पोलिंग बूथ इन इलाकों में गणतंत्र नहीं बल्कि गनतंत्र हावी था। चुनाव के लिए पोलिंग बूथ इंद्रावती नदी किनारे बसे छिंदनार समेत अन्य गांव में शिफ्ट करवाया जाता था। 2018 के चुनाव में नक्सलियों ने फरमान जारी किया था कि अगर किसी भी ग्रामीण की उंगली में अमिट स्याही दिखी तो उंगली काट दी जाएगी। हालांकि, कुछ साल पहले ही नदी के इस पार सुरक्षाबलों का कैंप स्थापित किया गया। इंद्रावती नदी पर छिंदनार और छोटे करका घाट पर पुल बनाया गया। जिसके बाद नदी पार जवानों की पैठ बढ़ी। अब नक्सली बैकफुट हुए हैं। ग्रामीण विकास चाहते हैं। आज भी लिखे हैं नक्सलियों के नारे नक्सलियों ने सरेंडर भले ही कर दिया है। लेकिन इन गांवों के सरकारी भवनों में आज भी नक्सलियों के देश विरोधी नारे लिखे हुए हैं। चुनाव का बहिष्कार करने की बात लिखी हुई है। जिस भवन पर नारे लिखे हैं वहीं पास में ही स्कूल है। यहां नक्सलियों की इतनी दहशत थी कि किसी ने भी नारे को मिटाने की जहमत नहीं उठाई। चौपाल की ये तस्वीरें देखिए… ………………………….. इससे जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… सरेंडर्ड नक्सलियों को मकान-जमीन…3 साल तक आर्थिक मदद: 210 माओवादियों ने डाले हथियार, संविधान की किताब-गुलाब से स्वागत, कार से आया सेंट्रल कमेटी मेंबर रूपेश जगदलपुर में 210 नक्सलियों ने पुलिस के सामने सरेंडर किया है। 153 हथियार भी सौंपे गए हैं। इनमें गुरुवार को बस्तर में सरेंडर करने वाले 140 और कांकेर में पहले आत्मसमर्पण कर चुके 60 से ज्यादा नक्सली शामिल हैं। इनमें महिला नक्सलियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। पढ़ें पूरी खबर…


