25 दिन तक 50 लोगों को छकाती रही थी बाघिन:4 हाथियों की मदद से काबू किया, 24 घंटे डॉक्टरों की निगरानी में

राजस्थान में बाघों की नस्ल बदलने की पहल शुरू हो गई है। इसके लिए 21 नवंबर को पहली बार पेंच टाइगर रिजर्व (MP) से बाघिन (PN- 224) को बूंदी के रामगढ़ विषधारी रिजर्व लाया गया। वह कुछ समय पहले ही अपनी मां से अलग हुई है। वह पेंच टाइगर रिजर्व में खुद की टेरिटरी बना रही थी। बाघिन 25 दिन तक वन विभाग की 50 सदस्यों वाली टीम को छकाती रही थी। आखिरकार 4 हाथी दल ने बाघिन को घेर कर काबू किया। इसके बाद उसे ट्रेंकुलाइज किया गया। बाघिन को बूंदी के रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा गया है। फॉरेस्ट की टीम 24 घंटे बाघिन की मॉनिटरिंग कर रही है। वो नए वातावरण में कैसे एडजस्ट करती है, उसके हेल्थ स्टेटस क्या हैं, उसका व्यवहार कैसा है। सब पर नजर रखे हुए हैं। वेटरनरी एक्सपर्ट भी लगातार मॉनिटरिंग करते रहेंगे। कुछ समय बाद सॉफ्ट एनक्लोजर से हार्ड एनक्लोजर में रिलीज करेंगे। इस पूरे अभियान में राजस्थान और मध्य प्रदेश की टीमें लगातार लगी रही थीं। बूंदी पुलिस परेड ग्राउंड व रामगढ़ रिजर्व के बजलिया में अस्थाई हेलीपेड बनाया गया था। 26 नवंबर को राजस्थान की टीम गई थी
इंटर स्टेट ट्रांस लोकेशन अभियान में मुकुंदरा टाइगर रिजर्व (कोटा) के मुख्य वन संरक्षक (CCF) सुगनाराम जाट भी शामिल थे। सोमवार को उन्होंने इस अभियान से जुड़े अनुभव साझा किए। सुगनाराम जाट ने बताया- बाघिन को लाने के लिए राजस्थान की टीम 26 नवंबर को पेंच के लिए रवाना हुई थी। पेंच प्रशासन ने दो-तीन बाघिन चिह्नित किए थे
पेंच प्रशासन ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के मापदंड के अनुसार, ऐसी बाघिन को चिह्नित करना था, जिसकी उम्र 2 से 3 साल के बीच हो। जो अपनी मां से कुछ समय पहले ही अलग हुई हो और अपनी टेरिटरी बना रही हो। पेंच प्रशासन ने दो-तीन बाघिन को चिह्नित किया था। 28 नवंबर से खोज रहे थे
28 नवंबर से जॉइंट टीम ने बाघिन की खोज शुरू की थी। ट्रैप कैमरा लगाया गया। हाथी दल, फील्ड टीम भी एक्टिव हुई। करीब 50 लोगों की टीम सुबह 6 बजे से अंधेरा होने तक जंगल में बाघिन की तलाश करती थी। में जुटी रही। 5 दिसंबर को बाघिन की लोकेशन मिली। उसे ट्रेंकुलाइज कर रेडियो कॉलर पहनाया, पर उसका कॉलर स्लिप हो गया। बाघिन फिर से ओझल हो गई थी। सुबह 6 से अंधेरा होने तक जंगल में सर्च करते थे
इसके बाद अभियान को ब्रेक दिया। कुछ दिन बाद अभियान को फिर शुरू किया। इस दौरान टीम जंगल में सर्च करती रही। 12 दिसंबर को सर्चिंग अभियान तेज किया गया। टीमें सुबह 6 बजे से अंधेरा होने तक बाघिन की तलाश में जुटी रही। इंटर स्टेट ट्रांस लोकेशन अभियान में मुकुंदरा टाइगर रिजर्व (कोटा) के मुख्य वन संरक्षक (CCF) सुगनाराम जाट 20 दिसंबर को फिर बाघिन दिखी, पर पकड़ में नहीं आई
20 दिसंबर को बाघिन की फिर से लोकेशन मिली। उसी इनपुट पर उसी सुबह टीम मौके पर पहुंची। सबसे पहले 2 एलिफेंट स्क्वॉड (हाथी दल) पहुंचा। उन्होंने बाघिन को आसपास लोकेट करने की कोशिश की। वो कामयाब भी हो गए। हाथी दल ने बाघिन की घेराबंदी भी की। हाथियों पर वेटरनरी डॉक्टर की टीम थी। बाघिन काफी एग्रेसिव व सतर्क रह रही थी। वो भी अपने आप को बचाते हुए इधर-उधर मूव कर रही थी। बाघिन किसी भी तरह का मौका नहीं दे रही थी। शाम करीब 4 बजे के आसपास डॉट लगाया। उनके एक-दो डॉट बेकार गए। उस दिन टीम वापस लौट आई। 21 दिसंबर की शाम को मिली कामयाबी
अगले दिन 21 दिसंबर को नई प्लानिंग के साथ मौके पर फिर से टीम पहुंची। इस बार दो की जगह चार हाथी स्क्वायड की मदद ली गई। चारों हाथियों पर ट्रेंकुलाइज टीम (वेटरनरी डॉक्टर्स) को बैठाया। टीम ने सुबह 6 बजे से अभियान शुरू किया। दोपहर तीन बजे तक बाघिन टीम को छकाती रही। आखिर में चार हाथियों के दल ने बाघिन को घेर कर काबू किया। उसके मूवमेंट के लिए जगह नहीं छोड़ी। फिर टीम ने मौका देख बाघिन को ट्रेंकुलाइज किया। मुख्य वन संरक्षक (CCF) सुगनाराम जाट ने बताया- इस तरह का अभियान काफी लर्निंग वाला होता है। इसमें काफी चुनौतियां रहती हैं। जैसे ग्राउंड पर टाइगर के बिहेवियर को समझना। 20 दिसंबर को हमें लगा कि टाइगर को डॉट लग गया है। लेकिन वह हल्का मिस हुआ था। हमें पता नहीं लगा। जैसे ही डॉट लगता है, जानवर कहीं ना कहीं छिपाने की कोशिश करता है। 20 से 25 मिनट बाद वो डाउन होने लगता है। उस गोल्डन टाइम में टाइगर को लोकेट करना बहुत जरूरी होता है। उस दौरान हम सर्च कर रहे थे, उसके पास पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। हमें अचानक पता लगा कि टाइगर को डॉट लगा ही नहीं है। भगवान का शुक्र रहा ग्राउंड टीम में किसी को कुछ नहीं हुआ। वो हमारे लिए लर्निंग लेसन था कि हमें ग्राउंड पर बड़ा सतर्क रहकर काम करना है। सुगनाराम ने बताया कि टाइगर की टेरिटरी प्राकृतिक वन क्षेत्र में होता है। जहां नाले, ऊबड़ खाबड़ पहाड़ियां होती हैं। घना जंगल, झाड़ियां होती हैं। इन परिस्थितियों में टाइगर को सर्च करना काफी चुनौती वाला होता है, क्योंकि टाइगर इन परिस्थितियों से वाकिफ होते हैं। उसको पहले ही आभास हो जाता है और वो जगह बदल लेता है। इस काम में टेक्नोलॉजी की मदद लेनी पड़ती है। ताकि उसके मूवमेंट का पता लगाया जा सके। पेंच प्रशासन टाइगर को ट्रेंकुलाइज करने में हाथियों की मदद ले रहा था। ये काफी मुश्किल भरा था। सीसीएफ ने बताया कि इंटर स्टेट टाइगर ट्रांस लोकेशन का मुख्य उद्देश्य टाइगर की पॉपुलेशन में जेनेटिक बेस को इंप्रूव करना है। दूसरा इनको विलुप्त होने से बचाना है। सेंट्रल इंडिया की साइंटिफिक स्टडी कहती है कि टाइगर रिजर्व के बीच में काफी कॉरिडोर व कनेक्टिविटी अच्छी है। उनके जेनेटिक बेस काफी ब्रॉड हैं। इससे हमारे यहां का जेनेटिक बेस बढ़ेगा। टाइग्रेस के एस्टेब्लिश होने व ब्रीड करने पर निश्चित रूप से आने वाले दिनों में अच्छे परिणाम आएंगे। मुख्य वन संरक्षक (CCF) सुगनाराम जाट कहते हैं- इंटर स्टेट टाइगर ट्रांस लोकेशन का 2018 में ओडिशा में प्रयास किया गया था। किन्हीं कारणों से उसमें सफलता नहीं मिली। राजस्थान के मायनों में यह पहली बार है कि दूसरे प्रदेश से टाइगर की शिफ्टिंग हुई है। राज्य के अंदर तो 2008 में रणथंभौर से सरिस्का में टाइगर शिफ्ट कर चुके हैं। — राजस्थान-बदलेगी बाघों की नस्ल, पहली बार MP से लाए बाघिन:सेना के हेलिकॉप्टर से जयपुर पहुंची राजस्थान के बाघों की नस्ल बदलने के लिए पहली बार मध्य प्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व से बाघिन को लाया गया है। रविवार रात 10.30 बजे सेना का MI-17 हेलिकॉप्टर 3 वर्ष की बाघिन ‘पीएन-224’ को लेकर जयपुर एयरपोर्ट पहुंचा। पढ़िए पूरी खबर…

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