रीवा शहर में रंगमंच के लिए उपयुक्त स्थान और रिहर्सल स्पेस न मिलने की मजबूरी ने एक रंगकर्मी को नया रास्ता तलाशने के लिए प्रेरित किया। नतीजतन, अपने ही घर की छत को थिएटर में तब्दील कर ‘टेरेस थिएटर’ की अनोखी पहल की गई। यह प्रयोग The Apple Tree Educational and Welfare Society के अंतर्गत किया गया, जिसकी शुरुआत प्रसिद्ध नाटक “द केयरटेकर” के मंचन से हुई। इस टेरेस थिएटर को तैयार करने में करीब 40 दिनों की लगातार मेहनत लगी। महज 30 हजार रुपए के सीमित बजट में लाइट, साउंड, सेट, प्रॉप्स और कलाकारों व दर्शकों के लिए अस्थायी शेडिंग की व्यवस्था की गई। फिलहाल शेडिंग के लिए टेंट का उपयोग किया जा रहा है, जबकि भविष्य में संसाधन मिलने पर स्थायी शेडिंग की योजना बनाई गई है। रीवा में नहीं है रिहर्सल स्पेस
निर्देशक प्रदीप तिवारी का कहना है कि रीवा में रंगमंच के लिए न तो नियमित रिहर्सल की जगह है और न ही कोई उपयुक्त थिएटर हॉल। उन्होंने बताया, “रंगमंच के लिए अभ्यास की नियमित और सुरक्षित जगह बेहद जरूरी होती है, लेकिन रीवा में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। थिएटर के अनुकूल स्थान की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी।” 12 साल का अनुभव, बाहर काम कर बचत से रंगमंच
प्रदीप तिवारी पिछले 12 वर्षों से रंगमंच से जुड़े हुए हैं और हाल ही में तीन वर्षीय नाट्य विद्यालय प्रशिक्षण पूरा कर पासआउट हुए हैं। वे बताते हैं कि रोज़गार के लिए बाहर जाकर काम करना पड़ता है और वहीं से जो बचत होती है, उसी से रीवा आकर रंगमंच की गतिविधियां संचालित करते हैं। उनका उद्देश्य है कि थिएटर के माध्यम से रीवा के बच्चों और युवाओं को शिक्षा और संस्कारों से जोड़ा जाए। इस पहल में परिवार का पूरा सहयोग मिला, जिसके बिना यह प्रयोग संभव नहीं हो पाता। ऑडिटोरियम हैं, लेकिन थिएटर के अनुरूप नहीं
प्रदीप तिवारी का कहना है कि रीवा में ऑडिटोरियम तो मौजूद हैं, लेकिन वे रंगमंच की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि थिएटर के लिए तकनीकी संसाधन जैसे लाइटिंग, साउंड सिस्टम और स्टेज की विशेष संरचना बेहद जरूरी होती है। इन सुविधाओं की कमी रीवा में लंबे समय से बनी हुई है। टेरेस थिएटर बना नया विकल्प
जगह और संसाधनों की कमी के बीच टेरेस थिएटर एक व्यावहारिक और रचनात्मक समाधान बनकर सामने आया है। सीमित संसाधनों में तैयार इस थिएटर में दो दिनों तक नाटक का सफल मंचन हुआ, जिसे दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला। रंगकर्मियों का मानना है कि यह पहल रीवा में रंगमंच को नई दिशा देने के साथ-साथ भविष्य में ऐसे वैकल्पिक मंचों के लिए प्रेरणा साबित हो सकती है।


