जल संसाधन विभाग में 35 साल की सेवा पूरी करने के बाद भी समयमान वेतनमान से वंचित रहे सब इंजीनियरों ने सरकारी सर्कुलर की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। मामले पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए जस्टिस मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। याचिका में उस शासनादेश को चुनौती दी गई है, जिसमें जल संसाधन विभाग के डिप्लोमा धारक सहायक अभियंताओं को 35 साल की नौकरी के बाद भी चतुर्थ समयमान-वेतनमान (अधीक्षण अभियंता के समकक्ष) से वंचित रखा गया है। याचिकाकर्ता बोले- 35 साल सेवा, तृतीय वेतनमान मिला लेकिन चतुर्थ से वंचित याचिकाकर्ता प्रवीण शर्मा (जबलपुर), राजू बामलिया (कटनी) और महेंद्र कुमार जैन (जबलपुर) ने बताया कि वे सभी जल संसाधन विभाग में उप अभियंता के पद पर कार्यरत रहे हैं और अब रिटायर्ड हो चुके हैं।उन्होंने 35 साल से अधिक सेवा पूर्ण की है। तृतीय कालावधि वेतनमान का लाभ मिला। लेकिन चतुर्थ कालावधि वेतनमान से वंचित रखा गया। याचिका में कहा गया है कि 14 अगस्त 2023 के शासकीय परिपत्र के खंड-3 के अनुसार, मध्यप्रदेश जल संसाधन विभाग राजपत्रित सेवा भर्ती नियम, 1968 में निर्धारित स्नातक डिग्री की अनिवार्यता के कारण यह लाभ निरस्त कर दिया गया। मुख्य अभियंता के आदेश में यह स्पष्ट कहा गया कि डिप्लोमा धारक इंजीनियर अधीक्षण अभियंता पद की योग्यता पूरी नहीं करते, इसलिए उन्हें चतुर्थ समयमान-वेतनमान नहीं मिल सकता। सर्कुलर संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं के अनुसार, याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि, यदि दो कर्मचारी समान पद पर 35 साल तक समान कार्य करते हैं, तो केवल शैक्षणिक योग्यता के आधार पर एक को लाभ देना और दूसरे को वंचित रखना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? हाईकोर्ट का नोटिस, सुनवाई चार सप्ताह बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस सर्कुलर की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका परप्रमुख सचिव (जल संसाधन विभाग), अभियंता-मुख्य और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है।अब चार सप्ताह बाद इस मामले की अगली सुनवाई होगी। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रशांत अवस्थी, असीम त्रिवेदी, आनंद शुक्ला, विनीत टेहेंगुनिया, शुभम पाटकर और प्रशांत सिमोलिया ने पैरवी की।


