राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर की एकलपीठ ने विदेश भेजने के नाम पर धोखाधड़ी के एक 36 साल पुराने मामले में सजा बढ़ाने की अपील और रिविजन याचिका दोनों को खारिज कर दिया है। जस्टिस फरजंद अली ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जो सजा दी है, वह कानून के दायरे में है और उसमें कोई अनियमितता नहीं है। मामला 1985 से चल रहा था और 1989 व 1993 से हाईकोर्ट में लंबित था। यह मामला नागौर जिले के बड़ी खाटू निवासी अजीज अली की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी चंद्र अवतार (गाजियाबाद, यूपी निवासी) और अब्दुल सलीम (मुरादाबाद के गजरौला निवासी) ने उन्हें विदेश भेजने का झांसा देकर 13,000 रुपये ठग लिए। FIR में कहा गया कि आरोपियों ने पासपोर्ट, वीजा और विदेश यात्रा का सारा इंतजाम करने का भरोसा दिलाया, लेकिन न तो काम पूरा हुआ और न ही पैसे वापस किए गए। 13 अन्य लोगों के साथ भी धोखाधड़ी का आरोप FIR में यह भी आरोप लगाया गया कि इसी तरह की धोखाधड़ी 13 अन्य लोगों के साथ भी की गई, जिससे उन्हें भी आर्थिक नुकसान हुआ। शिकायत में कहा गया कि कुछ रकम और सामान जबरन लिया गया, जिससे आरोपों की गंभीरता और बढ़ गई। इस संबंध में धोखाधड़ी, डकैती, और आपराधिक षड्यंत्र के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने 26 गवाहों की गवाही दी और कई दस्तावेज पेश किए, जबकि बचाव पक्ष ने दो गवाह पेश किए। 1988 में सुनाई गई थी 3 साल की सजा नागौर की एसीजेएम कोर्ट ने 8 नवंबर 1988 को फैसला सुनाते हुए दोनों आरोपियों को दोषी करार दिया। अब्दुल सलीम को 3 साल की सश्रम कारावास और कुल दो हजार रुपये जुर्माना की सजा दी गई। इसी तरह, चंद्र अवतार को 3 साल की सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माना की सजा दी गई। राज्य और शिकायतकर्ता दोनों ने की सजा में बढ़ोतरी मांग इस फैसले से नाखुश होकर राजस्थान सरकार ने 1993 में अपील दायर की और शिकायतकर्ता अजीज अली ने 1989 में रिविजन याचिका दाखिल की। दोनों ने सजा बढ़ाने की मांग की। राज्य ने तीन मुख्य आधारों पर सजा बढ़ाने की मांग की- पहला, मजिस्ट्रेट का फैसला कानून और मामले के तथ्यों के खिलाफ है; दूसरा, दी गई सजा अपर्याप्त है और कानून के अनुसार नहीं है; और तीसरा, अपराध की गंभीरता को देखते हुए उचित और पर्याप्त सजा दी जानी चाहिए थी। हाईकोर्ट ने कहा- सजा कानून के दायरे में है जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि सजा देने का मूल सिद्धांत यह है कि सजा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने दोषसिद्धि करने वाली अदालत को CrPC की धारा 235 और 255 के तहत आरोपी को सुनवाई का प्रभावी अवसर देने के बाद उचित सजा तय करने का व्यापक विवेक दिया है। शिकायतकर्ता को सजा बढ़ाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता को सजा की अपर्याप्तता को चुनौती देने का कोई स्वतंत्र वैधानिक अधिकार नहीं है। हालांकि, उचित मामलों में रिविजनल कोर्ट सजा की शुद्धता और उचितता की जांच कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि राज्य को parens patriae (समाज का संरक्षक) के रूप में सजा बढ़ाने का अधिकार है, लेकिन यह तभी, जब दी गई सजा अपराध की गंभीरता के स्पष्ट रूप से अनुपातहीन हो या ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण बातों की उपेक्षा की हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सजा बढ़ाने की शक्ति का उपयोग संयम और सावधानी से किया जाना चाहिए। अपीलीय अदालत को केवल राय के अंतर के आधार पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सजा बढ़ाना तभी उचित है जब सजा में विकृति, स्पष्ट अवैधता हो या प्रासंगिक कारकों पर विचार न करने के कारण यह स्पष्ट रूप से अपर्याप्त हो। न राज्य, न शिकायतकर्ता ठोस आधार पेश कर सके कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जिन अपराधों के लिए आरोपियों को दोषी ठहराया गया है, उनमें से किसी में भी न्यूनतम सजा का प्रावधान नहीं है। इसलिए ट्रायल कोर्ट के पास नाममात्र की सजा से लेकर अधिकतम सजा तक देने का व्यापक विवेक था। रिकॉर्ड में कोई ऐसी सामग्री नहीं है जो यह बताए कि मजिस्ट्रेट ने यह विवेक लापरवाही या असावधानी से इस्तेमाल किया। इसके विपरीत, दी गई सजा कानूनी ढांचे के भीतर है। चूंकि न राज्य और न ही शिकायतकर्ता हस्तक्षेप के लिए कोई ठोस आधार स्थापित करने में सफल नहीं हुए, इसलिए सजा बढ़ाने की अपील और रिविजन याचिका दोनों खारिज की जाती हैं।


