जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग (टीएडी) उदयपुर मुख्यालय के अधीन संचालित छात्रावासों और आवासीय विद्यालयों में भोजन सामग्री खरीदी को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ आरोप नहीं रहे। दस्तावेजी सबूतों के साथ यह मामला करीब 40 करोड़ रुपए के संभावित घोटाले में तब्दील हो चुका है। जुलाई-2025 से उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और बारां जिलों में सरकारी नियमों को खुली चुनौती देते हुए बड़े पैमाने पर खाद्यान्न सामग्री की खरीद की गई। चौंकाने वाली बात यह है कि यह खरीद न केवल बिना टेंडर हुई, बल्कि ऐसे छात्रावास अधीक्षकों से करवाई गई जिन्हें कानूनन खरीद का अधिकार ही नहीं है। सरकारी नियमानुसार किसी भी सरकारी खरीद के लिए संबंधित कार्यालय का उपापन संस्था होना और आहरण-वितरण का अधिकार होना अनिवार्य है। टीएडी के जिला अधिकारियों ने इन नियमों को दरकिनार कर छात्रावास अधीक्षकों से सीधे खरीद करवा दी। बांसवाड़ा जिले में तो मामला और भी गंभीर है। यहां टीएडी उपायुक्त अरुणा डिंडोर ने खाद्यान्न सामग्री की राशि सीधे छात्रावास अधीक्षकों को हस्तांतरित कर दी, जबकि टीएडी आयुक्त के आदेशों में स्पष्ट है कि खाद्यान्न सामग्री की उपापन संस्था स्वयं टीएडी उपायुक्त होती है। उपभोक्ता भंडार की आड़ में निजी संस्था से फर्जी सप्लाई
प्रतापगढ़ जिले में तो पूरे सिस्टम की पोल खुल गई, जहां अधिकारियों ने सहकारी उपभोक्ता भंडार से मिलते-जुलते नाम वाली निजी संस्था कांठल प्राथमिक सहकारी उपभोक्ता भंडार (प्रतापगढ़) से बिना किसी टेंडर के पूरे जिले में खाद्यान्न आपूर्ति दिखा दी। सवाल जो मांग रहे जवाब… लापरवाही या मिलीभगत? रजिस्ट्रार के पत्र से पकड़ाई धांधली
अब इस मामले में अतिरिक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां का गत 30 जनवरी का पत्र सामने आया है। इसने पूरे मामले को विस्फोटक बना दिया है। कांठल प्राथमिक सहकारी उपभोक्ता भंडार का कार्यक्षेत्र केवल प्रतापगढ़ के वार्ड 25 से 40 तक सीमित है। यह संस्था केवल अपने पंजीकृत सदस्यों को ही सामग्री दे सकती है। इसे किसी भी सरकारी विभाग, छात्रावास या आवासीय विद्यालय को सप्लाई करने का कोई अधिकार नहीं है। यानी इन सबके बावजूद इसी संस्था के नाम से टीएडी छात्रावासों में लाखों रुपए की खाद्यान्न सप्लाई दर्ज कर दी गई। आरटीटीपी नियमों से बचने का खेल, मंत्री के आदेश भी बेअसर दस्तावेज बताते हैं कि अधीक्षकों से हर माह 80 हजार से लेकर 4-5 लाख रुपए तक की खरीद करवाई गई। कहीं एकमुश्त बड़े बिल बनाए गए तो कहीं 10 हजार से कम के कई छोटे बिल काटकर आरटीटीपी नियमों से बचने की कोशिश की गई। शिकायतों में यह भी गंभीर आरोप है कि बिलों में दर्शाई गई लगभग 50% सामग्री छात्रावासों तक पहुंची ही नहीं, जबकि भुगतान पूरी राशि का किया गया। निर्देशों की पालना नहीं
बता दें, पहले छात्रावासों में खाद्यान्न आपूर्ति स्वच्छ परियोजना और उपभोक्ता भंडारों के माध्यम से होती थी। आरटीपीपी नियमों की बाध्यता के बाद आपूर्ति रुकी। इसके बाद टीएडी कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने विभाग स्तर पर टेंडर जारी करने के स्पष्ट निर्देश दिए, लेकिन आज तक उन निर्देशों की पालना नहीं हुई। नतीजा यह हुआ कि न टेंडर, न वैकल्पिक व्यवस्था अनधिकृत खरीद और फर्जी सप्लाई का पूरा तंत्र खड़ा हो गया। जवाब से बच रहे जिम्मेदार
मामले में जब दैनिक भास्कर ने टीएडी कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी और विभाग के अतिरिक्त आयुक्त-प्रथम कृष्णपाल सिंह चौहान से संपर्क करना चाहा, तो बार-बार कॉल के बावजूद दोनों ने फोन रिसीव नहीं किया।


