400 साल पुरानी रूहानी विरासत…‘गुड्डी’ की ऊंचाई तय करती तरक्की की चढ़ाई

पुशांत मोदगिल | लुधियाना महानगर के पक्खोवाल रोड पर बसे शांत गांव दाद की मिट्टी में 400 साल पुराना एक ऐसा गौरवमयी इतिहास रचा-बसा है जो हर साल बसंत पंचमी के पांच दिन बाद अपनी पूरी दिव्यता के साथ जीवंत हो उठता है। यह गाथा है भाई बाला जी की जिनके निस्वार्थ प्रेम और सेवा से प्रसन्न होकर छठी पातशाही श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने उन्हें इस पावन धरती को अपनी तपोस्थली बनाने का वरदान दिया था। आज ‘गुरुद्वारा समाध भाई बाला जी’ न केवल श्रद्धा का केंद्र है बल्कि लुधियाना की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। इसी उपलक्ष्य में 28 और 29 जनवरी को आयोजित होने वाले दो दिवसीय मेले में सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल देखने को मिलेगी। मान्यता के अनुसार इस अवसर पर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु न केवल नतमस्तक होंगे बल्कि पतंगबाजी की अनूठी परंपरा को भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे। जहां इस स्थान की रूहानी जड़ें 400 साल पुरानी हैं वहीं वर्तमान गुरुद्वारा साहिब का भव्य स्वरूप अपेक्षाकृत नया है। समाध भाई बाला जी पर निर्मित मौजूदा गुरुद्वारा साहिब का निर्माण लगभग 30 वर्ष पूर्व किया गया था। स्थानीय संगत और प्रबंधक कमेटी के सहयोग से तैयार यह सुंदर दरबार आज उसी प्राचीन तपस्या को आधुनिक दौर में एक व्यवस्थित और भव्य पहचान दे रहा है जहां हर साल हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु नतमस्तक होते हैं। इस पावन धरती का इतिहास गौरव की स्याही से लिखा गया है। 1618 में जन्मे भाई बाला जी का जन्म पंजाब के घुडाणी कलां का है जो लुधियाना जिले की पायल तहसील का एक गांव है। भाई बाला जी के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब ग्वालियर की कैद से रिहा होने के बाद स्वयं गुरु हरगोबिंद साहिब जी उनके गृह-स्थान पर 45 दिनों तक ठहरे थे। गुरु साहिब के आदेश पर ही 1630-35 के मध्य भाई बाला जी दाद गांव आए और यहीं अपनी साधना पूरी की। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान चरनजीत सिंह ग्रेवाल बताते हैं कि भाई बाला जी की 15वीं पीढ़ी का आज भी यहां नतमस्तक होना इस स्थान की ऐतिहासिक प्रमाणिकता का सबसे बड़ा सबूत है। गांव दाद में 28 और 29 जनवरी को आयोजित होने वाले दो दिवसीय समागम की शुरुआत अखंड पाठ साहिब की लड़ी के साथ होगी जिसके बाद ढाडी दरबार की ओजस्वी गूंज और रागी जत्थों द्वारा सुनाया जाने वाला भाई बाला जी का जीवन वृत्तांत संगत को मंत्रमुग्ध कर देगा। पक्खोवाल रोड से गांव की गलियों तक अटूट लंगर बरतेगा। जहां इस बार भी विश्वास की डोर और खुशहाली की उड़ान हर चेहरे पर मुस्कान बिखेरेगी। लुधियाना का प्रसिद्ध ‘भाई वाला चौक’ भी बाबा जी की इसी महान विरासत का प्रतीक है।

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