कुणाल बार-बार मुझसे पूछता है- मां, मैं फिर खेल पाऊंगा या नहीं? मेरे पास जवाब नहीं होता, सिर्फ आंसू होते हैं… यह शब्द छिंदवाड़ा के मासूम कुणाल की मां लक्ष्मी के हैं, जिनका पांच साल का बेटा जहरीले कफ सिरप की भेंट चढ़ते-चढ़ते बच तो गया, लेकिन उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। 115 दिन तक मौत से जंग लड़ने के बाद घर लौटा कुणाल आज न देख पा रहा है, न चल पा रहा है, जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते और सपने बुनते हैं, उसी उम्र में कुणाल बिस्तर पर लेटा अपने ठीक होने का इंतजार कर रहा है। बता दें की जहरीले कोल्ड्रिफ कप सिरप ने छिंदवाड़ा में 24 मासूम जिंदगियों को छीन लिया। पहले जान लेते हैं पूरा मामला, अब तक 24 मासूमों की मौत
छिंदवाड़ा जिले में जहरीले कोल्डरिफ कफ सिरप से जिले में अब तक 24 मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है। जाटाछापर गांव का पांच साल का कुणाल भी इसी जहरीली दवा का शिकार हुआ, लेकिन वह 115 दिन तक मौत से लड़कर किसी तरह बच गया। मामूली बुखार और जुकाम के इलाज के लिए 24 अगस्त 2025 को परासिया के डॉक्टर प्रवीण सोनी ने उसे यह कफ सिरप दिया था। परिजनों को अंदाजा भी नहीं था कि यह दवा उनके बच्चे की जिंदगी बदल देगी। कुछ ही दिनों में कुणाल की हालत बिगड़ने लगी। शरीर सूज गया, पेशाब आना बंद सा हो गया और जांच में सामने आया कि उसकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया है। 31 अगस्त को उसे नागपुर रेफर किया गया, जहां 115 दिन तक उसका इलाज चला। इस दौरान उसे 8 से 10 बार डायलिसिस कराना पड़ा। उसी अस्पताल में भर्ती अन्य बच्चों में से 7 बच्चों की मौत हो गई, जबकि कुणाल अकेला ऐसा बच्चा रहा, जो जिंदगी की जंग जीत पाया।हालांकि 23 दिसंबर को कुणाल घर लौट आया, लेकिन जहरीले सिरप का असर उसकी आंखों और पैरों पर रह गया। वह न देख पा रहा है, न चल पा रहा है। पहले तब और अब की की दो तस्वीरें… 9 लाख खर्च, भैंसें और जेवर बिके, फिर भी इलाज बाकी
कुणाल के पिता टिंकू यदुवंशी का कहना है कि बेटे की जान बचाने के लिए मेरे पास जो था, वह सब झोंक दिया। सरकार से 4 लाख 25 हजार रुपए की मदद जरूर मिली, लेकिन डॉक्टर कह रहे हैं कि आगे के इलाज और पुनर्वास में अभी और पैसा लगेगा। अब हालत यह है कि बेचने को कुछ बचा ही नहीं है। नागपुर में इलाज के दौरान हालात बहुत मुश्किल थे। अस्पताल में कुणाल के बिस्तर के नीचे चादर बिछाकर सिर्फ एक व्यक्ति को रुकने दिया जाता था, बाकी लोगों को बाहर बरामदे में रात गुजारनी पड़ती थी। उस वक्त मैं, मेरी पत्नी लक्ष्मी और कुणाल के दो मामा लगातार उसके साथ रहे। मौसी और बुआ भी आते-जाते रहे। पूरे परिवार ने मिलकर अपने बच्चे की जान बचाने की हर संभव कोशिश की। कुणाल के पिता टिंकू यदुवंशी के पिता का कहना है कि घर के सामने वही गली है, वही मिट्टी और वही बच्चों का शोर, लेकिन अब उस शोर में कुणाल की हंसी नहीं गूंजती। जिस जगह वह कभी सबसे तेज दौड़ता था, आज वहीं खिड़की से बच्चों को खेलते हुए सुनता है, उसकी आंखें अब रोशनी नहीं पहचानतीं, पैर उसका साथ नहीं देते और पांच साल का बच्चा अपने ही घर में कैद होकर रह गया है। कुछ महीने पहले तक उसकी जिंदगी बिल्कुल आम बच्चों जैसी थी। सुबह खेल की जिद, स्कूल की तैयारी और शाम को दोस्तों के साथ गली में शोर मचाना। वह अपने मामा की तरह फौजी बनना चाहता था। हमें क्या पता था कि एक मामूली सर्दी-जुकाम उसकी पूरी दुनिया उजाड़ देगा। नौकरी छूटी, आर्थिक हालत बिगड़े
कुणाल के पिता टिंकू यदुवंशी ने बताया कि वह एक माइक्रो फाइनेंस कंपनी में काम करते थे, जहां उन्हें 25 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था। कुणाल से बड़ी उसकी एक बहन है, जो कक्षा दूसरी में एक निजी स्कूल में पढ़ती है। परिवार में कुणाल के दादा दूध का व्यवसाय करते हैं, जिससे फिलहाल घर में दाल-रोटी का इंतजाम हो पा रहा है, लेकिन इलाज के दौरान ली गई उधारी और कुणाल के आगे के इलाज के लिए पैसों की जिम्मेदारी अब भी बनी हुई है। छिंदवाड़ा आने के बाद कुणाल ज्यादातर समय घर में ही लेटा रहता है। बाहर खेलते बच्चों की आवाजें सुनकर वह चुपचाप खिड़की की ओर मुंह कर लेता है, मानो मन ही मन खुद को फिर से उनके बीच दौड़ता हुआ महसूस करने की कोशिश करता हो। कभी-कभी वह अपनी मां से मासूमियत से पूछता है, “मैं फिर खेल पाऊंगा ना?” इस सवाल का मां के पास कोई जवाब नहीं होता- सिर्फ आंखों में आंसू होते हैं। मां बोली- बस एक ही दुआ, बच्चे का बचपन वापस मिल जाए
कुणाल की मां लक्ष्मी देवी का कहना है कि जब कुणाल घर लौटा तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। पूरा गांव जश्न मना रहा था। जाटाछापर के हर घर से उसके लिए दुआ निकल रही थी। लेकिन यह खुशी पूरी नहीं थी। जहर अपना असर दिखा चुका था। मेरे बेटे की आंखों की रोशनी चली गई है, उसके पैर उसका साथ नहीं दे रहे। वह खड़ा तक नहीं हो पाता। जो बच्चा कभी दौड़ते-दौड़ते गिर जाया करता था, आज बिस्तर से उठने के लिए भी सहारे का मोहताज है। बेटा घर तो आ गया है, लेकिन मन में हर वक्त डर रहता है। समझ नहीं आता कि वह फिर देख पाएगा या नहीं, चल पाएगा या नहीं। कहीं ऐसा न हो कि उसे पूरी जिंदगी इसी हालत में बितानी पड़े। हर रात उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बस भगवान से यही दुआ करती हूं कि मेरे बच्चे का बचपन उसे वापस मिल जाए। जमानत याचिका टली, 5 जनवरी को होगी सुनवाई
जहरीले कफ सिरप के सेवन से बच्चों की मौत के मामले में आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी और फार्मासिस्ट सौरभ जैन की जमानत याचिका एक बार फिर टल गई है। दोनों की जमानत पर 17 दिसंबर को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन किन्हीं तकनीकी कारणों से उस दिन बहस नहीं हो सकी। पीड़ित पक्ष के वकील संजय पटोरिया ने बताया कि सुनवाई नहीं हो पाने के कारण अब इस मामले में 5 जनवरी को अगली तारीख तय की गई है। गौरतलब है कि इस मामले में 4 अक्टूबर की देर रात अपराध दर्ज किया गया था। इसके बाद बच्चों की पर्चियों पर कोल्ड्रिफ कफ सिरप लिखने वाले डॉ. प्रवीण सोनी को सबसे पहले गिरफ्तार किया गया था। जांच के दौरान फार्मासिस्ट सौरभ जैन की भूमिका भी सामने आने पर उसे भी आरोपी बनाया गया। वहीं, इस मामले में कफ सिरप बनाने वाली कंपनी के मालिक रंगनाथन की जमानत को लेकर अब तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी है। न तो उनकी ओर से अब तक जमानत याचिका दायर की गई है और न ही किसी वकील ने अदालत में उनकी तरफ से पेशी की है।


