500 एकड़ खेत 2 महीने बाद भी रेगिस्तान, दिन रेत हटाने में गुजरते हैं, ठंडी रातें टेंटों में

एकजुट… मिलकर 700 एकड़ जमीन लेवल की धुस्सी बांध के पास मोहिंदर सिंह के खेतों में फिर से हरियाली लौट रही है। रेत कम आई थी, लेकिन पानी 6 फीट तक चढ़ा था। मोहिंदर कहते हैं- ‘फसल कटेगी तो सबसे पहले शुक्राना करेंगे …फिर थोड़ा हिस्सा उन किसानों को देंगे, जिन्होंने हमें खड़ा किया।’ दो महीने से पंजाब के अलग-अलग जिलों से किसान ट्रैक्टर लेकर आ रहे हैं। खुद का डीजल। और दूसरों के खेत। करीब 700 एकड़ जमीन दोबारा लेवल की गई है। रेत खेतों से निकाली जा रही है। सरपंच परिवार… दूसरों को जमीन दान कर दी बाउपुर में परमजीत सिंह और उनके भाई सरपंच गुरमीत सिंह मिलते हैं। 50 खेतों की खेती। लगभग 60 लाख का नुकसान। गांव के छोटे किसान, जिनके घर और खेत दोनों गए उन्हें सरपंच परिवार ने 10–10 मरले जमीन दान में दी। गांव के कुछ मजदूरों के घर पानी में डूब गए। आज उनका पूरा परिवार सरपंच के घर में रहता है। ऐसा काम सिर्फ किसान कर सकता है- जो खुद डूबे… पर किसी और को बचा ले। सकत्तर सिंह… आधे खेत बहे, घर की दीवार गिरी कालू… मां और बच्चे सर्द रातों में दूसरों पर निर्भर मिल्खा सिंह… 3 साल रेत निकालने में लग जाएंगे हरप्रीत कौर… पति खोया, अब रेत में खेत ढूंढ रही ब्यास की बाढ़ के बाद… पढ़िए एक ऐसा संघर्ष, जो सर्द रातों में भी ठंडा नहीं पड़ रहा सुल्तानपुर लोधी के बाउपुर जदीद में रेत से घिरे खेतों के किनारे बने टेंटों में बीत रही किसानों की जिंदगी।{फोटो : दीपक कुमार सकत्तर सिंह के घर की दीवार गिरी हुई है। वह खुद मरम्मत कर रहे हैं। समझाते हैं- ‘हमारे लिए किसान दिवस रोज होता है। बुजुर्ग बाढ़ झेलते रहे। फिर मेरी बारी आई। अब पोते भी यही देख रहे हैं। 6 खेत थे। 3 रेत में चले गए। 2 महीने पानी उतरने में गए। 2 महीने लेवल बराबर होने का इंतजार। परिवार खेत और घर दोनों में लगा है।’ कुछ ही कदम आगे बूढ़े मिल्खा सिंह मिलते हैं। 75 साल के। वह कहते हैं- ‘मेरी 18 एकड़ जमीन,… घर,… जानवरों के शेड… सब पानी और रेत निगल गई।’ युवावस्था में अमृतसर से आए थे। दूध बेचकर एक-एक करके खेत खरीदे। सब फिर से शुरू करना है। अब 2-3 साल लग जाएंगे खेतों में मिट्टी भरने में।’ खेत श्रमिक कालू ने बताया कि सबसे बड़ा रोटी का संकट हम खेत मजदूरों पर आया है। तीन भाइयों के घर बह गए। हमारे पास घर बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। कोई रोजगार भी नहीं है। मदद भी बंद हो चुकी है। 35 साल की उम्र में बुजुर्ग मां और बच्चे सर्द रातों में दूसरों पर निर्भर हैं। राम गौरा पहुंचते ही हरप्रीत कौर मिलती हैं। छोटा सा घर। कमरे से पति गुरजंट सिंह की तस्वीर लाती हैं। 2023 की बाढ़ में 2.5 एकड़ खेत रेत में दब गए थे। पति ने फांसी लगा ली। 2025 की बाढ़ ने वही खेत रेत से भर दिए। हरप्रीत कहती हैं- ‘मां कैसे टूट सकती है… बच्चों के लिए खड़ी रहना है।’ 23 दिसंबर। किसान दिवस। इस शब्द में ही संघर्ष की मिट्टी मिली है। ब्यास की बाढ़ उतरे महीनों हो गए। मदद करने लोग लौट गए हैं, पर सुल्तानपुर लोधी के खेत आज भी लड़ाई लड़ रहे हैं। हम बाउपुर जदीद टापू में दाखिल होते हैं। सर्द हवा खाल चीरती है। दिन मिट्टी फिर से जोतने में जाता है, रातें रेत से घिरे खेतों के किनारे बने टेंटों में बीतती हैं। जहां जमीन थी, वहां अब रेत के टीले हैं। जहां घर थे, वहां अंधेरा और टूटी ईंटें। किसान अपने हाथों से वही नींव फिर से खड़ी कर रहे हैं, जिसे दरिया एक बार फिर बहा ले गया। हर चेहरा थका है। लेकिन हर आंख में उम्मीद का छोटा-सा दिया अब भी जल रहा है। यहां जिंदगी एक ही फ्रेम में दिखती है- दिन में रेत निकालना, रात में ईंटें संभालना। सुबह फिर वही सबकुछ दोहराना। रामपुर गौरा पहुंचते ही हर आंगन में निर्माण होता दिखता है। कुल मिलाकर करीब 500 एकड़ खेत बर्बाद। 50 करोड़ से ज्यादा की लागत डूबी। किसान परमजीत सिंह बताते हैं- ‘2023 की बाढ़ से गरीब परिवार 2024 के अंत तक संभले थे…अब फिर से वहीं खड़े हैं जहां से चले थे। जब खेत नहीं बचे तो मजदूर भी बेरोजगार हो गए।’ कुल नुकसान असल में तीन गुना बैठता है। ब्यास की रेत में दबे ये खेत किसान का संघर्ष नहीं, किसान की जिद हैं।

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