51 उपस्वास्थ्य केंद्रों के पास अपना भवन नहीं:ये झोलाछाप नहीं, सरकारी स्वास्थ्य कर्मी हैं, गांव-गांव घूमकर इलाज करने को मजबूर

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को गांव तक पहुंचाने वाले ‘आरएचओ’ यानी ग्रामीण स्वास्थ्य अधिकारी इन दिनों झोलाछाप डॉक्टरों की तरह गांव-गांव घूमकर इलाज करने को मजबूर हैं। वजह- जिले के 198 उप स्वास्थ्य केंद्रों में से 51 केंद्रों के पास खुद का भवन नहीं है। दैनिक भास्कर की टीम ने शहर से 37 किमी दूर तखतपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत टांडा का दौरा कर ऐसे हालात का जायजा लिया। वहां आरएचओ गोपाल लहरे मरीजों को तलाशते नहीं, बल्कि मरीज उन्हें तलाशते हुए साइकल दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र या गांव के किसी पंच के घर पहुंच रहे थे। बिल्हा ब्लाक में 19 कोटा 15 तखतपुर 10 और मस्तुरी में 7 जगह भवन नहीं है। 12 साल में 5 भवन, 51 अब भी बेघर: जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, 2013 में 10 नए उप स्वास्थ्य केंद्रों की स्वीकृति मिली थी, लेकिन 12 साल में सिर्फ 5 को ही भवन मिल पाया। बाकी केंद्रों के आरएचओ अब भी पंचायत भवन, आंगनबाड़ी, या निजी घरों में इलाज कर रहे हैं। 3 ठिकाने, 13 मरीज, एक दिन की ड्यूटी
ग्राम टांडा में भास्कर वहां पहुंची, जहां साइकिल दुकान में बैठे मरीज का गोपाल लहरे इलाज कर रहे थे। वे कुछ समय आंगनबाड़ी केंद्र में इलाज करते दिखे। लेकिन भवन के ताले लगते ही वह गांव के एक पंच के घर में बैठकर मरीजों को देख रहे थे। महज दो घंटे में 13 मरीजों का इलाज। पर कोई टेबल नहीं, न कोई रजिस्टर रखने की जगह, न ही मरीजों की निजता का ध्यान रखने वाला कोई ढांचा। आंगनबाड़ी खुला रहता है तो वहां बैठते हैं, नहीं तो पंचायत भवन या किसी के घर। ज्यादातर समय तो गांव में घूमते हुए ही इलाज करना पड़ता है। इलाज कहीं पर भी, दवाएं घर में मौजूद
ग्राम बेलमुंडी के आरएचओ बताते हैं कि उन्हें जहां जगह मिलती है, वहीं इलाज करना पड़ता है। अधिकांश मरीजों के पास उनका मोबाइल नंबर है। फोन आता है तो या तो मैं पहुंच जाता हूं या उन्हें कहीं बुला लेता हूं। दवाएं, रिपोर्ट फॉर्म, रजिस्टर जैसी आवश्यक सामग्री उनके खुद के घर में रखी है, क्योंकि कोई स्थायी जगह नहीं है। बैठने की जगह नही, संक्रमण का खतरा
कोटा के एक आरएचओ के अंतर्गत 4 से 6 गांव आते हैं। बरसात और गर्मी में बिना भवन के इलाज करना चुनौती बन जाता है। संक्रमण भी फैल सकता है। टांडा आंगनबाड़ी में मितानिन शीला भवन में ताला लगाकर मीटिंग के लिए गनियारी जा रही थीं। उन्होंने कहा भवन आंगनबाड़ी का है। इन दिक्कतों से जूझ रहे हैं आरएचओ और मरीज पंचायत के सहयोग से इलाज करने का निर्देश
एक आरएचओ को 5 से 8 गांव इलाज के लिए जाना पड़ता है। भवन विहीन वाली जगहों पर आंगनबाड़ी और ग्राम पंचायत के सहयोग लेकर मरीजों का इलाज करने का निर्देश दिया गया है। जल्द ही शासन को भवनों के लिए पत्र लिखा जाएगा। -डॉ शुभा गढ़ेवाल, सीएमएचओ भास्कर एक्सपर्ट – डॉ राजेश शुक्ला, तत्कालीन सीएमएचओ आंगनबाड़ी और पंचायत भवन का उपयोग करें स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले आरएचओ को अगर इलाज के लिए टेबल, कुर्सी, और छत तक नसीब नहीं है, तो यह सवाल व्यवस्था के इरादों पर है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि बिना भवन वाले 51 उपस्वास्थ्य केंद्रों को प्राथमिकता से भवन आवंटित करें। अस्थायी रूप से मोबाइल हेल्थ यूनिट या कंटेनर क्लिनिक की सुविधा दें। आंगनबाड़ी केंद्र और पंचायत भवन के उपयोग के लिए स्थायी समझौता और सहयोग नीति लागू करें।

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