मध्य प्रदेश में जनगणना का काम फिर से 6 महीने के लिए टाल दिया गया है। अब सरकार को 30 जून 2025 तक प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव करने की अनुमति दी गई है। इसके बाद सीमाओं को फ्रीज कर रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी जाएगी। जनगणना शुरू करने का फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय करेगा। जनगणना निदेशक भावना वालिम्बे ने बताया कि मुख्य सचिव को पत्र भेजा गया है। इसमें कहा गया है कि सरकार 30 जून 2025 तक जिलों, तहसीलों, गांवों, शहरों और अन्य प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं में बदलाव कर सकती है। इसके बाद रिपोर्ट जनगणना निदेशालय को भेजनी होगी। 15 साल से जनगणना नहीं हुई देश में साल 2011 के बाद से जनगणना नहीं हुई है। तीन महीने पहले जनगणना निदेशालय एमपी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि 31 दिसंबर 2024 तक एमपी में सभी जिलों, गांवों, शहरों और तहसीलों व वन क्षेत्रों की प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज कर इसकी जानकारी दी जाए। इसके बाद यह माना जा रहा था कि एक जनवरी के बाद कभी भी देश के अन्य राज्यों के साथ एमपी में भी जनगणना शुरू हो सकती है। इसमें यह भी कहा गया था कि प्रदेश के सभी संबंधित विभागों, खासतौर पर पंचायत और ग्रामीण विकास, नगरीय आवास और विकास विभाग, राजस्व विभाग और वन विभाग को यह निर्देश जारी करें कि राज्य की सभी प्रशासनिक इकाइयों, जैसे जिले, तहसील, राजस्व ग्राम, वन ग्राम, नगरीय निकाय और उनके वार्डों आदि की सीमाओं को बदलने की स्थिति हो तो यह काम 31 दिसंबर तक पूरा कर लिया जाए। अक्टूबर 2024 में भी लिखी थी चिट्ठी केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भारत के महा रजिस्ट्रार कार्यालय ने 8 अक्टूबर 2024 को पत्र लिखकर कहा था कि प्रदेश के मुख्य सचिव आगामी जनगणना के लिए प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं को 31 दिसंबर 2024 तक फ्रीज करने की कार्यवाही पूरी करेंगे। अगर कोई परिवर्तन होता है तो इसकी जानकारी जनगणना निदेशालय को 1 जनवरी 2025 से पहले दी जाए। पिछले साल भी 30 जून तक बढ़ाई गई थी टाइम लिमिट भारत सरकार के जनगणना निदेशालय ने कोरोना के कारण 25 मार्च 2020 को जनगणना स्थगित कर दी थी। इसके बाद प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन की स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए गए थे कि अगर कोई बदलाव किया जाना है, तो इसे 30 जून 2024 तक पूरा कर लें। इसके बाद इसकी समय सीमा 31 दिसंबर 2024 तय कर, इसी तारीख तक प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज करने के लिए कहा गया। जनगणना में देरी से क्या असर पड़ेगा? सरकार जो योजनाएं बनती है और लागू करती है, उसमें जनगणना का अहम रोल होता है। जैसे 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी 121 करोड़ है। नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट- 2013 के मुताबिक देश की 67% आबादी ऐसी है जो सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) से जुड़ी योजनाओं की हकदार है। यानी, करीब 80 करोड़ लोग इस दायरे में आते हैं। यही वजह है कि हाल ही में केंद्र ने जो मुफ्त अनाज योजना लॉन्च की, उसका लाभ 80 करोड़ लोगों तक पहुंचाने का दावा किया गया है, लेकिन पिछले दस साल में जो आबादी बढ़ी है। उसका अब तक कोई रिकॉर्ड नहीं है। वो गरीब परिवार, जो पिछले दस साल में इस तरह की स्कीम के हकदार बने हैं उन्हें 2023-24 तक इंतजार करना होगा। अगर जनगणना समय पर होती तो उन्हें ये लाभ 2021 से मिलने लगता। इसे ऐसे समझिए। आधार डेटा और अन्य पॉपुलेशन प्रोजेक्टर्स के मुताबिक देश की मौजूदा आबादी करीब 139 करोड़ है। अगर इस आबादी के 67% लोगों को PDS कवर का हकदार माना जाए तो करीब 93 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज और सरकार की मुफ्त राशन आदि योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। जनगणना नहीं होने के कारण करीब 13 करोड़ लोग इन योजनाओं से वंचित हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा UP और बिहार के लोग शामिल हैं। जहां आबादी और गरीबों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है। पूरी खबर पढ़ें…


