700 शिकायतें भी अफसर–नेताओं को नींद से नहीं जगा पाई:मौत से पहले मेयर-हेल्पलाइन से मदद मांगी, फिर मुख्यमंत्री से भी, इंदौर त्रासदी की इनसाइड स्टोरी

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 16 मौतों के बाद सरकार ने सभी 16 नगर निगम और 413 नगरीय निकायों के लिए एसओपी जारी की है। इसके मुताबिक सभी को अगले सात दिनों में पेयजल सप्लाई करने वाली पाइपलाइन की जांच करना है। ये सांप निकलने के बाद लकीर पीटने जैसा कदम है। दरअसल, इंदौर के लोग पिछले 6 महीने से गंदे पानी की 311 महापौर हेल्पलाइन में शिकायत कर रहे थे लेकिन नगर निगम के अफसरों ने कोई एक्शन नहीं लिया। वहीं इंदौर के लोगों ने सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत की थी। इसमें भागीरथपुरा वार्ड के लोगों ने 11 शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुंचाई थीं। इसके बाद भी अफसरों ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया। संडे स्टोरी में सिलसिलेवार पढ़िए आखिर कैसे इंदौर नगर निगम की 311 हेल्पलाइन और सीएम हेल्पलाइन लोगों के लिए हेल्पलेस साबित हो रही है। दावा- 3 सेकेंड में शिकायत पर एक्शन, हकीकत- 700 शिकायतें पेंडिंग
नगर निगम की 311 महापौर हेल्पलाइन की डेस्क कैसे काम करती है ये जानने हम हेल्पलाइन के कंट्रोल रूम पहुंचे। यहां 12 से 15 कर्मचारी एक शिकायतों की मॉनिटरिंग और उनके निराकरण के प्रक्रिया को अंजाम देते हैं। एप पर आने वाली शिकायत को एक कर्मचारी वॉकी टॉकी पर संबंधित क्षेत्र के प्रभारी को फॉरवर्ड करता है और उसके निराकरण की दिशा में काम शुरू हो जाता है। कंट्रोल रूम के सुपरवाइजर दीपक साहू बताते हैं कि शिकायतों को नेचर के हिसाब से डिवाइड करते हैं और उनका निराकरण किया जाता है। हमारी टीम किसी भी शिकायत पर तीन सेकेंड में एक्टिव हो जाती है। शिकायत जैसे ही सिस्टम पर ड्रॉप होती है, उसका वार्ड और क्षेत्र देखा जाता है और संबंधित प्रभारी को फारवर्ड कर दिया जाता है। संबंधित प्रभारी उसका निराकरण शुरू कर देता है। कुछ शिकायतें, जिनका तत्काल निराकरण किया जा सकता है, जैसे कचरा गाड़ी ना आना, कचरा उठाना वह कुछ घंटों में सॉल्व कर दी जाती है। कुछ शिकायतों में तीन से सात दिन का समय लगता है। साहू बताते हैं कि कई शिकायतें ऐसी भी होती है, जिनमें टेंडर प्रक्रिया की आवश्यकता होती है वह जरूर पेंडिंग रहती है। आरोप- बिना समाधान के बंद कर देते हैं शिकायत
इंदौर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे कहते हैं कि 311 ऐप पर छोटी-मोटी शिकायतों का निपटारा तो कर दिया जाता है, लेकिन बदबूदार पानी, ओवरफ्लो होती ड्रेनेज लाइनें और पीने के पानी में मिलती सीवेज की गंदगी जैसी जानलेवा शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं। वर्तमान में ऐसी लगभग 700 शिकायतें हैं, जो महीनों से “निराकरण की प्रक्रिया” में हैं। भागीरथपुरा के लोगों की गंदे पानी की गुहार भी इन्हीं 700 शिकायतों के ढेर में कहीं दबी पड़ी थी। पीड़ित बोले- शिकायत करें तो किससे करें?
इस डिजिटल सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता उन लोगों के लिए है जो तकनीक से दूर हैं। भागीरथपुरा की 70 वर्षीय लक्ष्मीबाई के कच्चे घर के ठीक पीछे सीवेज चैंबर है, जिसका गंदा पानी सीधे उनके घर में घुसता है। उल्टी-दस्त से कमजोर हो चुकीं लक्ष्मीबाई के पास न तो स्मार्टफोन है और न ही शिकायत दर्ज कराने का ज्ञान। वे रोते हुए कहती हैं, “इतने पैसे नहीं कि घर ऊंचा करवा लूं। सरकार बस चैंबर साफ करवा दे तो गंदा पानी तो घर में नहीं आएगा।” वहीं, एक अन्य निवासी दीपक का गुस्सा अधिकारियों के रवैये पर है। उनके घर के सामने सीवेज लाइन पीने के पानी की हौद (टंकी) में मिल जाती है। वे कहते हैं, “रोज नल आने से पहले हौद से गंदगी साफ करनी पड़ती है। शिकायत करो तो कोई आता नहीं और अगर आ भी गया तो हम पर ही धौंस दिखाते हैं कि शिकायत क्यों की।” 16 मौतों के बाद अब शिकायत का सिस्टम अपग्रेड करने का दावा
इस बड़ी त्रासदी के बाद प्रशासन की नींद टूटी है। 311 हेल्पलाइन की जिम्मेदारी अब आईएएस अर्थ जैन को सौंपी गई है, जिन्होंने सिस्टम में बड़े सुधारों का दावा किया है। स्मार्ट सिटी के सीईओ अर्थ जैन कहते हैं, “हमने सिस्टम की खामियों को पहचान कर उसे अपग्रेड किया है। अब हर छोटी-बड़ी शिकायत पर गंभीरता से काम होगा और निराकरण के बाद भी टीम शिकायतकर्ता के संपर्क में रहेगी। अब जानिए सीएम हेल्पलाइन पर कितनी शिकायतें आईं
सीएम हेल्प लाइन में शिकायतों के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में गंदा पानी की सप्लाई होने की सबसे ज्यादा शिकायतें इंदौर के लोगों ने की है। यहां से 100 अलग–अलग समय पर लोगों ने यह शिकायत सीएम हेल्प लाइन में की थीं। जिस भागीरथपुरा में दूषित पानी ने 15 लोगों की जान ले ली, उस वार्ड के लोग 11 शिकायतें मुख्यमंत्री तक भेज चुके थे। बावजूद इसके अफसरों ने गंभीरता से नहीं लिया। खास बात तो यह है कि इंदौर 100 में से 80 शिकायतें सहायक यंत्री के स्तर पर लंबित पड़ी हैं। यानी नगर निगम में जल यंत्री से लेकर कमिश्नर तक ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा सीवर से जुड़ी 550 शिकायतें सीएम हेल्पलाइन में दर्ज कराई गई हैं। जिनका समाधान नहीं हो पाया है। दूसरे नंबर पर ग्वालियर हैं। यहां से गंदे पानी की सप्लाई होने की 59 शिकायतें सीएम हेल्प लाइन में की गई। इसमें से 47 शिकायतें उस अफसर के समक्ष लंबित है, जिसे समाधान करना है। तीसरे नंबर पर रीवा और चौथे नंबर पर रतलाम है। रतलाम के 18 मोहल्ले में दूषित पानी की सप्लाई
रतलाम में दूषित पानी की सप्लाई की 24 शिकायतें सीएम हेल्पलाइन में की गई लेकिन समाधान नहीं हुआ। इसमें से 22 शिकायतें उस अफसर के समक्ष लंबित है, जिसे समाधान करना है। शहर के 18 मोहल्ले के लोगों ने कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचकर शिकायत तक दर्ज कराई। लेकिन नगर निगम के अफसरों ने समस्या का समाधान करने की रिपोर्ट पेश कर दी। वार्ड नंबर 24 से तीन शिकायतें सीएम हेल्प लाइन में दर्ज कराई गई। वार्ड के पार्षद सलीम मोहम्मद बागवान ने ओझाखाली क्षेत्र में सप्लाई होने वाले पानी का सैंपल लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की जिला जल जांच लैब में कराया था। इस रिपोर्ट में सामने आया कि कई पैरामीटर में दूषित मात्रा से काफी ज्यादा मात्रा पाई गई। बावजूद इसके नगर निगम ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। 15 नगर निगम में 69% शिकायतें आगे ही नहीं बढ़ी
सीएम हेल्प लाइन में दर्ज 322 में से 229 शिकायतों का प्रारंभिक स्तर पर समाधान नहीं हुआ। यानी जो शिकायतें मुख्य मंत्री कार्यालय तक पहुंची। उन्हें भी गंभीरता से नहीं लिया गया। इसमें से 42 शिकायतें जल यंत्री के समक्ष लंबित हैं। केवल जबलपुर में 16 में से 4 शिकायतें कमिश्नर लेवल पर पेंडिंग है। सरकार की एसओपी, 20 साल पुरानी पाइप लाइन 2 दिन में सुधरेगी
इंदौर में दूषित पेयजल से मौतें होने के 10 दिन बाद राज्य सरकार ने शहरी क्षेत्रों में वाटर सप्लाई सिस्टम को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। जिसमें शहरी क्षेत्रों में वाटर सप्लाई सिस्टम का मेंटनेंस, लीकेज और पाइपलाइन रिसाव पहचान, पेयजल गुणवत्ता सुनिश्चित करने एवं शिकायत निवारण तंत्र सुदृढ़ीकरण के मानक प्रक्रिया तय कर दी है। अब शहर में वाटर सप्लाई का 7 दिन में सर्वे करना होगा। सघन आबादी वाले क्षेत्रों में बिछी हुई 20 वर्ष से अधिक पुरानी पाइपलाइन का चिह्नांकन कर रिसाव को 48 घंटे के भीतर सुधारना होगा। चार बड़े शहरों में 1 हजार करोड़ खर्च, नहीं मिला साफ पानी
विधानसभा में 2019 को पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि भोपाल-इंदौर के 8.95 लाख लोगों को गंदा पानी मिला। इससे भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख लोग शामिल हैं। रिपोर्ट में ये भी लिखा कि ओवरहेड टैंक नियमित साफ नहीं किए जा रहे, इसके बाद भी नगर निगम ने कोई एक्शन नहीं लिया। रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2018 के बीच भोपाल और इंदौर नगरीय क्षेत्र में 4,481 पानी के नमूने (भौतिक, रासायनिक और बैक्टीरिया परीक्षण वाले) पीने लायक नहीं पाए गए। स्वतंत्र जांच में 54 नमूनों में से 10 खराब पाए गए, उनमें गंदगी और मल कोलीफॉर्म था। इसके जवाब में राज्य शासन ने स्वीकार किया था कि दूषित पानी पीने से 5.45 लाख जलजनित बीमार हुए थे। बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार ने एशियन डेवलपमेंट बैंक से चार बड़े शहर, भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर, में पानी के प्रबंधन के लिए 200 मिलियन डॉलर ( 906.4 करोड़ रुपए) का कर्ज 25 साल के लिए लिया था। यह पैसा शहरों में पानी की आपूर्ति को बढ़ाने और उसकी गुणवत्ता सुधारने के लिए था। प्रोजेक्ट के अनुसार हर किसी को पर्याप्त और साफ पानी मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया था। लोन अवधि के अब सिर्फ चार साल बचे हैं, लेकिन अब भी शुद्ध पानी की सप्लाई पूरी तरह से नहीं हो पा रही है।

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