80-90 के दशक से ही पीलीभीत बना आतंकियों का आश्रय:पंजाब से बुलाए जाते थे आतंकी, बड़ी घटनाओं के बाद घने जंगलों में लेते थे शरण

पीलीभीत में सोमवार को सुबह तड़के पूरनपुर कोतवाली क्षेत्र के हरदोई नहर ब्रांच पर पीलीभीत और पंजाब पुलिस की संयुक्त मुठभेड़ में तीन आतंकवादियों के मारे जाने की खबर से पूरा जिला दहल गया। हालांकि यह कोई पहला मामला नहीं है। 80-90 के दशक से ही पीलीभीत आतंकियों का आश्रय बना हुआ है। 80-90 के दशक में पीलीभीत में रहने वाले लोग खुद ही पंजाब से अपराधियों को अपने यहां बुलाते थे और शरण देकर इनका उपयोग कॉन्ट्रैक्ट किलर के रूप में करते थे। बाद में ये आतंकवादी पेशेवर कॉन्ट्रैक्ट किलिंग बन गए। कुछ आतंकवाद से जुड़ गए। इसके बाद से पीलीभीत धीरे-धीरे आतंकवादियों को शरणालय बनता गया। पीलीभीत के घने जंगल आतंकियों की पहली पसंद पंजाब से आए खालिस्तानी आतंकवादियों ने पीलीभीत में ठहरना इसलिए उचित समझा, क्योंकि यहां उनके पास कई दिनों तक छिपने के लिए बेहतर जगहें थीं। दरअसल पीलीभीत के घने जंगल छिपने के लिए आतंकवादियों को खूब भाते हैं। कोई भी बड़ी घटना करने के बाद आतंकवादी घने जंगलों के बीच बने घरों में छिप जाते थे। जिन तक पहुंचने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। इन घने जंगलों में नेटवर्क की समस्या के कारण छिपे हुए आतंकियों को ट्रैक करना भी बेहद चुनौतीपूर्ण रहता है। इंदिरा गांधी हत्याकांड की यादें ताजा पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिख दंगे हुए थे। इसके बाद सन 1987 से 90 तक पीलीभीत जबरदस्त तरीके से आतंकवाद की जद में आ गया था। खालिस्तान कमांडो फोर्स, बब्बर खालसा, भिंडरा वाला टाइगर फोर्स आदि तमाम संगठन सक्रिय हो गए थे। इसी दौरान घुंघचाई क्षेत्र के दियूरिया क्षेत्र के जंगल में कटरूआ (सब्जी ) बीनने गए 29 ग्रामीणों को भी आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था। जिसमें तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री रामलाल राही ने भी घटना स्थल का दौरा किया था। कई पुलिस कर्मी हो चुके शहीद 80 से 90 के दशक में पीलीभीत कई आतंकी हमलों का गवाह बना। इस दौरान आतंकियों के हमलों में जिले के कई इंस्पेक्टर और पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। इनमें माधोटांडा इंस्पेक्टर जितेंद्र सिंह यादव और हजार थानाध्यक्ष राजेंद्र सिंह त्यागी भी शामिल हैं। हालांकि मुठभेड़ में पहले भी कई आतंकवादियों को मार गिराया जा चुका है। 7 ग्रामीणों को उतार दिया था मौत के घाट इसके अलावा न्यूरिया थाने के मंडरिया गांव में आतंकवादियों ने 7 ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया था। उस समय केंद्रीय गृहमंत्री एसबी चव्हाण पीलीभीत आए थे। तब सुलखान सिंह जिले के पुलिस कप्तान थे। 1989 में आतंकियों ने हजारा थाने को बम से उड़ा दिया गया था। वहां आतंकवादियों को पकड़ने में कामयाब रहे तत्कालीन थाना अध्यक्ष धर्मवीर सिंह रस्तोगी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला था। शहीद हुए राजेंद्र सिंह त्यागी की स्मृति में अभी कुछ दिन पहले ही पुलिस लाइन के गेट का बरेली रेंज के आईजी डा. राकेश सिंह ने अनावरण किया है। 31 दिसंबर 1984 को पूरी रात हुई थी मुठभेड़ जानकार बताते हैं कि 1984 में हुए दंगों के बाद से जिले में आतंकवाद की घटनाएं बढ़ गई थी पंजाब से आए आतंकवादी 1984 में हुए घटनाक्रम को टारगेट करते हुए लोगों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतारते थे लेकिन समय बीतने के साथ-साथ पुलिस ने घटनाओं से सबक लेते हुए आतंकवाद के खाते में के लिए अभियान चलाया और 31 दिसंबर को पहली बार मुठभेड़ हुई जिसमें पूरी रात दोनों तरफ से गोलियां चल और तीन आतंकवादियों को पुलिस ने ढेर कर दिया। 1991 में पुलिस को ट्रैप करने के लिए टांगा था युवक का शव थाना हजारा में घटित हुई घटना इतिहास में पुलिस के लिए बुरा दिन मानी जाती है, वर्ष 1991 में आतंकवादियों ने एक व्यक्ति की हत्या कर उसकी लाश को टांग दिया था जैसे ही पुलिस मौके पर पहुंची तो आईईडी ब्लास्ट कर दिया. यह पहली ऐसी घटना थी, जिसमे 7 पुलिस कर्मी शहीद हुए थे. इस घटना के बाद पुलिस ने भी रणनीति के तहत काम करते हुए आतंकवादियों के हमले से बचने के लिए अभ्यास किया और जगह-जगह अभियान चला कर आतंकवादियों के खात्मे की शुरुआत कर दी।

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