राजधानी में पिछले एक साल के भीतर 8680 से अधिक लोगों से 60 करोड़ रुपए से ज्यादा का साइबर फ्रॉड हुआ है। इनमें से सिर्फ 210 मामलों में ही पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। बाकी 8470 मामलों में शिकायतों की जांच चल रही है, जो अब ठंडे बस्ते में चली गई है। इन मामलों में न तो आरोपियों को पकड़ने का प्रयास हो रहा है और न ही रकम की रिकवरी की कोशिश की जा रही है। कई पीड़ित अब भी थानों के चक्कर काट रहे हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उनकी पहली प्राथमिकता पीड़ित का पैसा वापस दिलाना होता है। थाना या साइबर सेल में कोई भी पीड़ित आता है तो उसके खाते की जानकारी लेकर रकम होल्ड कराने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए संबंधित बैंक को मेल किया जाता है। इसके बाद पीड़ित की शिकायत पर केस दर्ज किया जाता है। रोजाना हर थाने में साइबर फ्रॉड की शिकायतें आ रही हैं। पहले इनकी जांच की जाती है, उसके बाद एफआईआर दर्ज होती है। पीड़ित एफआईआर या आरोपियों को पकड़वाने से ज्यादा अपना पैसा वापस चाहते हैं, लेकिन उन्हें वह भी नहीं मिल पा रहा है। 60 करोड़ की ठगी में सिर्फ डेढ़ प्रतिशत की वापसी
पिछले साल 60 करोड़ रुपए से अधिक की ठगी हुई है। इसमें से पुलिस ने 11 करोड़ 25 लाख रुपए होल्ड कराए हैं। इसमें से भी सिर्फ 90 लाख रुपए ही पीडितों को वापस मिल पाए हैं। बाकी रकम अभी भी खातों में होल्ड है। उस पैसे को निकालने के लिए पीड़ित थानों के चक्कर काट रहे हैं। यानी पुलिस कुल ठगी की रकम का सिर्फ डेढ़ प्रतिशत ही वापस करा पाई है, जबकि करीब 18 प्रतिशत रकम ही खातों में होल्ड कराई गई है। यह ठगी की कुल राशि के मुकाबले बहुत कम है। अधिकांश मामलों में समझौता, 15 केस में ही सजा
पुलिस के पास आने वाली कुल शिकायतों में से सिर्फ 2.41 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दर्ज हुई है। इनमें भी सजा की दर बेहद कम है। पुलिस ने 210 मामलों में एफआईआर की है, जिनमें से मुश्किल से 15 मामलों में ही सजा हो पाई है। अधिकांश मामलों में आरोपी और पीड़ित के बीच समझौता हो जाता है। ठग पकड़े जाने के बाद पीड़ित को पैसा लौटाकर केस वापस करा दिया जाता है या फिर मामले अदालत में विचाराधीन रहते हैं। साइबर पोर्टल में शिकायत के बाद भी एफआईआर नहीं
केंद्र सरकार के साइबर क्राइम पोर्टल और हेल्पलाइन नंबर 1930 पर लोग सीधे फ्रॉड की शिकायतें कर रहे हैं। वहां से संबंधित थाने को रिपोर्ट भी भेजी जा रही है। पिछले साल साइबर पोर्टल पर 8680 लोगों ने शिकायतें दर्ज कराई हैं। इन शिकायतों को कार्रवाई के लिए रायपुर पुलिस को भेजा गया, इसके बावजूद अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पुलिस सिर्फ 5 लाख रुपए से ऊपर के मामलों में एफआईआर कर रही है। साइबर रेंज थाने में 10 से 20 लाख रुपए से ऊपर के मामलों में ही एफआईआर ली जा रही है। 10-20 हजार रुपए के मामलों में थानों में भी सुनवाई नहीं हो रही है, जबकि इसी तरह की ठगी के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। भास्कर एक्सपर्ट – मुकेश चौधरी, साइबर क्राइम एक्सपर्ट हर मामले में एफआईआर की जरूरत इससे ठगों का सिम-खाता ब्लॉक होगा पुलिस को साइबर फ्रॉड के अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। क्योंकि एफआईआर होने पर ही ठगों का सिम और बैंक खाता ब्लॉक कराया जा सकता है और उनकी जानकारी निकालकर गिरोह तक पहुंचा जा सकता है। एफआईआर नहीं होने की वजह से देश में साइबर फ्रॉड लगातार बढ़ रहा है। मामलों की ठीक से विवेचना भी नहीं हो पा रही है। पुलिस अक्सर सिर्फ उस व्यक्ति तक पहुंच पाती है, जिसके नाम पर सिम या खाता होता है, लेकिन गिरोह के असली सरगना तक नहीं पहुंच पाती।


