एसआईआर सर्वे को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बार फिर निशाना साधा है, भूपेश बघेल ने कहा कि अब तक हम सुनते आए हैं कि सांप के काटने से मौत होती है, लेकिन अब केंचुआ के काटने से भी मौत हो रही है। दैनिक भास्कर से बातचीत में भूपेश बघेल ने कहा कि, बीएलओ बहुत मुश्किल से फॉर्म इकठ्ठा कर पा रहे हैं, बीएलओ के ऊपर शिकायतें भी आ रही हैं,भारतीय जनता पार्टी के गुंडे धमका भी रहे हैं,सर्वर भी काम नहीं कर रहा है, एक घंटे में 2-3 फॉर्म ही अपलोड हो रहा है, एक महीने की समय-सीमा की वजह से और केंचुआ के काटने की वजह से बीएलओ की मौत हो रही है, केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग, अब तक हमने सुना कि सांप-बिच्छू के डसने से मौत होती है, अब केंचुआ के डसने से दर्जनों बीएलओ की मौत हो रही है, एसआईआर में बड़े पैमाने पर नाम काटने की तैयारी है, कहा जा रहा है कि इससे अवैध रुप से रह रहे बांग्लादेशियों को बाहर किया जाएगा, लेकिन सरकार अब तक आंकड़ा नहीं दे पाई है कि कितने बांग्लादेशी हैं। SIR के नाम पर नाम काटने की है तैयारी भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि SIR के नाम पर बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम हटाने की तैयारी है। सरकार कह रही है कि यह अवैध बांग्लादेशियों को बाहर करने के लिए किया जा रहा है, लेकिन अब तक यह नहीं बताया गया कि छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशियों की संख्या कितनी है। बघेल ने इसे एक राजनीतिक खेल करार दिया। रायपुर में भी सर्वे के दौरान सामने आया था विवाद कुछ दिनों पहले एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पुरानी बस्ती के महंत लक्ष्मी नारायण दास वार्ड (क्रमांक 42) का विवाद सामने आया था। सर्वे के दौरान एक महिला बीएलओ भावुक होकर रो पड़ी थी और उन्होंने भाजपा पार्षद पर धमकी देने का आरोप लगाया था। इस घटना के बाद कांग्रेस ने पार्षद पर एफआईआर की मांग की, जबकि भाजपा ने महिला बीएलओ के खिलाफ निर्वाचन आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। बढ़ाई जाए एसआईआर सर्वे की समय-सीमा-कांग्रेस कांग्रेस ने SIR की समय सीमा तीन महीने बढ़ाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि इस समय राज्य में धान खरीदी का सीजन पूरे चरम पर है और किसान बेहद व्यस्त हैं, ऐसे में ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में लोग SIR प्रक्रिया में पूरी तरह हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं। कांग्रेस ने यह भी कहा कि BLO द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन किया जाना चाहिए और मतदाता से लिखित पुष्टि ली जानी चाहिए। फोटो और फोटो कॉपी जैसी सुविधाएं दूरस्थ इलाकों में उपलब्ध नहीं होती, इसलिए उनकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग को लेनी चाहिए।


