मोनिका कुमारी | अमृतसर दृढ़ इच्छा शक्ति और पक्के इरादे से विकलांगता को पीछे छोड़ा जा सकता है। विकलांग होने के बाद भी हजारों युवाओं ने अपने हुनर से बेहतर मुकाम हासिल किया है। उनमें से एक हैं छेहर्टा के पास कोटली मियांखा गांव के रहने वाले विक्रम। विक्रम देख नहीं सकते, लेकिन उन्होंने अपनी इस कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया। आज वह अच्छे सिंगर होने के साथ कविताएं भी लिख चुके हैं। वह मास्टर सलीम, कलेर कंठ और साबर कोटी जैसे सिंगरों के साथ गा चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता का नाम बलविंदर सिंह और माता का नाम परमजीत कौर है। जब विक्रम का जन्म हुआ तो वह उनका परिवार दुखी तो हुआ लेकिन उन्होंने विक्रम को नजरदांत नहीं किया। उन्होंने विक्रम का बहुत से डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन उनकी आंखे नहीं आ सकी। उन्हें नॉर्मल स्कूल में डाला गया, लेकिन नॉर्मल स्कूल में केवल वह सुनने वाली चीजें ही सीख पाते थे। लिखने की चीजें वह समझ नहीं पा रहे थे। उन्हें किसी ब्लाइंड बच्चे के पेरेंट्स ने अंध विद्यालय के बारे में बताया। 2005 में विक्रम अंध विद्यालय में पहुंचे। शुरू में पहली बार वह घर और माता पिता से दूर रहे थे तो उन्हें बहुत मुश्किल आई। उनके पेरेंट्स भी दुखी हुए, लेकिन बाद में वहीं रहकर पढ़ाई की। विक्रम ने म्यूजिक में ग्रेजुएशन करके बीएड की। अभी वह पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं। वह आगे पीएचडी करेंगे। अभी वायलन, गिटार, ढोलक, तबला, हारमोनियम, कीबोर्ड सब बजा लेते हैं। 2 बीएड करने के दौरान यूथ फेस्ट में विनर रहे। वह सुफी और फॉक गाते हैं। उन्होंने भ्रूण हत्या, मां और अन्य सामाजिक मुद्दों पर हिंदी, पंजाबी में कविताएं भी लिखी हैं। वह मिमिक्री और कॉमेडी भी करते हैं। उनके टीचर शैमूअल, जगमोहन तनेजा, अशोक सैनी, रोमी कुमार ने उन्हें ऑल राउंडर बनाया। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की आंखे जन्मजात या हादसे के कारण चली जाती हैं तो इसे अपनी कमजोरी न समझें। आप थोड़ी ज्यादा मेहनत करके नॉर्मल बच्चों को पीछे छोड़ सकते हैं। आंखे न होने को पॉजिटिव लें, इससे आप सही तरीके से फोकस कर सकते हैं। उन्होंने सोसाइटी के लिए कहा कि दिव्यांगों के टैलेंट को समझें। उन्हें रिस्पेक्ट दें।


