जो सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार नहीं करता, वह वास्तविक सुख नहीं पा सकता: मुनि महाराज

भास्कर न्यूज |लुधियाना सुंदर नगर जैन स्थानक में शुक्रवार का दिन आत्मिक ज्ञान की वर्षा से सराबोर रहा। इस पावन अवसर पर उपाध्याय जितेंद्र मुनि महाराज ने अपने ओजस्वी और अमृत तुल्य प्रवचनों से उपस्थित विशाल जनसमूह को जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराया। मुनि महाराज ने सुख और दुःख के चिरंतन विषय पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुख-दुःख का रहस्य दोनों ही भाव में आत्मा के अधीन हैं। जो व्यक्ति सुख और दुःख दोनों को समान भाव से स्वीकार नहीं करता वह कभी भी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। हमारे जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना का बीज हमारे शुभ और अशुभ कर्मों में छिपा हुआ है। मुनि महाराज ने कहा कि बाहरी सुंदरता तब तक व्यर्थ है जब तक व्यक्ति के कर्म अच्छे न हों। मनुष्य के कर्मों का फल उसे हर हाल में भोगना पड़ता है। मुनि महाराज ने आत्म-शुद्धि को मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बताया। उन्होंने उपदेश दिया कि जो व्यक्ति जीवन में अधिक सहन करता है उसके न केवल कर्म कटते हैं बल्कि उसके पुण्य में भी वृद्धि होती है व आत्मिक रिद्धि संसार के सभी क्षणभंगुर सुखों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। प्रवचन के दौरान मुनि महाराज ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक सिद्धांत दिया एक का दो न हो और दो का एक न हो। इसका संकेत धन और संपत्ति के संग्रह तथा स्थिरता से है। इसका अर्थ है कि संचित धन और संपत्ति अनावश्यक रूप से कम न हों और न ही वे अनुचित तरीके से विभाजित हों। संपत्ति की स्थिरता और सुव्यवस्था बनी रहे। समापन में जितेंद्र मुनि महाराज ने जनसमूह को निर्भय जीवन जीने का उपदेश दिया।

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