‘हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें’:लखनऊ मुशायरा ने जीता शायरों का दिल, वाह वाह करते हुए झूम उठे श्रोता

लखनऊ के गोमतीनगर स्थित यूपी दर्शन पार्क में कोशल साहित्य महोत्सव जारी है। जिसमें लखनवी तहजीब और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत रंग देखने को मिल रहा है। 27 नवम्बर से 30 नवम्बर तक विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन हो रहे है। इसी क्रम में मुशायरा का आयोजन हुआ। जिसमे मुख्य रूप प्रसिद्ध शायर वसीम बरेलवी समेत कई शायरों और कवियों ने हिस्सा लिया । मुशायरा सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। वरिष्ठ शायर वसीम बरेलवी की अध्यक्षता में मुशायरा हुआ। जिसमें अज़हर इकबाल , शारिक कैफ़ी, मनीष शुक्ला अभिषेक शुक्ला , फरहत एहसास और हिना रिजवी ने अपने बेहतरीन अंदाज और शानदार शायरी से लोगों को वाह वाह करने पर मजबूर कर दिया। सर्दी के इस मौसम में देर रात तक चलने वाले मुशायरे में बड़ी संख्या में युवा मौजूद रहे जो बहुत ही दिलचस्पी के साथ मुशायरे को सुन रहे थे। सीनियर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी ने कहा कि लखनऊ शहर अदब , तहजीब और संस्कृति को अपने दामन में समेटे हुए हैं। इस शहर में आना और मुशायरा पढ़ना हमेशा मेरे लिए बेहद खास होता है। शहर की हवाओं से भी अदब की खुशबू आती है । शहर ने उर्दू अदब को नई पहचान दिया और तमाम बड़े शायरों ने यहां जन्म लिया । मुशायरा के संचालन कर रहे हैं अजहर इकबाल ने कहा कि लखनऊ जैसा शहर हमें कहीं नहीं मिलता ना ऐसे श्रोता मिलते हैं। यह शहर गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है। मुशायरा में पढ़े गए कुछ शेर… हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें तुम ने मेरे घर न आने की क़सम खाई तो है आँसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें वसीम बरेलवी बात बनाओ बात बनाती अच्छी लगती हो खाओ झूठी कसमें खाओ अच्छी लगती हो सिगरेट बस यूँ पीता हूँ तुम मना करो मुझको तुम समझाओ तुम समझाती अच्छी लगती हो अजहर इकबाल आख़िरी कोशिश भी कर के देखते फिर उसी दर से गुज़र के देखते गुफ़्तुगू का कोई तो मिलता सिरा फिर उसे नाराज़ कर के देखते मनीष शुक्ला वो आसमाँ है तो हो मैं ज़मीन हूँ ख़ुश हूँ अना के शहर में जब से मकीन हूँ ख़ुश हूँ ये जानती हूँ के रहते हैं साँप इस में मगर अभी भी पहने वही आस्तीन हूँ ख़ुश हूँ हिना रिजवी

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