जोरावर सिंह गेट स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में पीजी बैच 2025 के नए चिकित्सकों के लिए चल रहा 23 दिवसीय इंडक्शन कार्यक्रम शनिवार को ऑडिटोरियम में समाप्त हुआ। कार्यक्रम में आयुर्वेद शिक्षा, शोध, क्लीनिकल ट्रेनिंग और आधुनिक तकनीक के उपयोग से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी गई, ताकि नए विद्यार्थियों को संस्थान की शैक्षणिक व्यवस्था और शोध संरचना का पूरा परिचय मिल सके। समापन समारोह में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. पी.के. प्रजापति, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा, शल्य तंत्र विभागाध्यक्ष प्रो. पी. हेमंथा कुमार, कुलसचिव प्रो. अनीता शर्मा, संयुक्त निदेशक जे.पी. शर्मा और डीन (पीजी) प्रो. गोपेश मंगल मौजूद रहे। समारोह में संस्थान के डीन, विभागाध्यक्ष, चिकित्सक और शिक्षकों ने सहभागिता की। पीजी शिक्षा करियर और व्यक्तित्व निर्माण की दिशा तय करती है समापन समारोह में संबोधन देते हुए प्रो. पी.के. प्रजापति ने बताया कि पीजी स्तर की शिक्षा किसी भी चिकित्सक के करियर में निर्णायक भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में शोध, नवाचार और वैश्विक स्तर पर चिकित्सा सेवा को आगे बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं। विद्यार्थियों को परिश्रम और अनुशासन के साथ शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आयुर्वेद की अंतरराष्ट्रीय पहचान में नई पीढ़ी की सक्रिय भूमिका अहम होगी। संस्थान का उद्देश्य क्लिनिकल एक्सीलेंस के साथ शोधार्थियों को तैयार करना है राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि संस्था केवल चिकित्सक तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे शोधार्थियों को विकसित करने पर फोकस है जो भविष्य में आयुर्वेद को नई दिशा दे सकें। उन्होंने बताया कि संस्थान आधुनिक तकनीक, संसाधनों और क्लीनिकल प्रैक्टिस के साथ शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं में लगातार सुधार कर रहा है। कुलपति ने विद्यार्थियों को ईमानदारी, नैतिकता और समर्पण को अपने पेशे का आधार बनाने की सलाह दी। 50 व्याख्यानों के माध्यम से शोध, तकनीक और क्लीनिकल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग डीन (पीजी) प्रो. गोपेश मंगल ने बताया कि इंडक्शन कार्यक्रम में नए बैच को स्नातकोत्तर अध्ययन की संरचना, शोध के महत्व और संस्थान की क्लीनिकल सेवाओं का विस्तृत परिचय दिया गया। इस दौरान आयुर्वेद विशेषज्ञों ने 50 व्याख्यान प्रस्तुत किए, जिनमें आयुर्वेद सिद्धांत, अनुसंधान पद्धति, चिकित्सकीय आचार, आधुनिक तकनीकी सहयोग, नैदानिक प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास शामिल रहे। उन्होंने बताया कि इन व्याख्यानों ने नए विद्यार्थियों को अकादमिक मार्गदर्शन देने के साथ उच्च स्तरीय शोध और पेशेवर उत्कृष्टता की दिशा भी दिखाई।


