इंदौर में बुधवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के साथ व्यापक संवाद किया। रवींद्र नाट्यगृह में आयोजित इस कार्यक्रम के लिए लगभग 1000 प्रबुद्धजनों को आमंत्रित किया गया था। दोपहर 2.30 बजे शुरू हुए इस आयोजन में तीन क्रमबद्ध सत्र हुए। संघ की शताब्दी यात्रा, हिंदुत्व की विचारधारा और अंत में प्रश्न-उत्तर। संघ की सौ वर्ष की यात्रा का वर्णन
पहले सत्र में होसबाले ने 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित संघ की शताब्दी यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस यज्ञकुंड में 1925 में राष्ट्रसेवा की पहली आहुति डाली गई थी, वह आज विश्व के सबसे बड़े संगठनों में से एक के रूप में खड़ा है। उन्होंने बताया कि संघ ने केवल शाखाओं का विस्तार नहीं किया, बल्कि संगठित, समरस और राष्ट्रनिष्ठ समाज निर्माण का उद्देश्य साधा।
इस दौरान देशभर में संचालित 1.70 लाख सेवा प्रकल्पों-बाल संस्कार केंद्र, वनवासी कल्याण, ग्राम विकास, पर्यावरण संरक्षण जैसी गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया।द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर की राष्ट्रनीति, अनुशासन और आध्यात्मिक दृष्टि को उन्होंने संघ की निरंतर प्रेरणा बताया। होसबाले ने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और साझा स्मृतियों से निर्मित जीवंत चेतना है। हिंदुत्व: भारत की आत्मा और समाज का स्वभाव
दूसरे सत्र में सरकार्यवाह ने हिंदुत्व की वैचारिक आधारशिला पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि “हिंदुत्व सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि समाज का स्वभाव, जीवन का व्यवहार और मूल्य-मान्यता है।” उन्होंने कहा कि यह भूमि हमारी माता है और हम उसके पुत्र। यही भाव भारतीय संस्कृति को प्रकृति संरक्षण का मूल संस्कार देता है। उन्होंने ‘भारत’ शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा कि ‘भा’ का अर्थ प्रकाश है-अर्थात जो ज्ञान के प्रकाश में रत हो वही भारत है।
यह भारतवर्ष की आध्यात्मिक पहचान की पुष्टि करता है। होसबाले ने यह भी कहा कि गुरुनानक देव जी ने ‘हिंदुस्तान’ शब्द को व्यापक लोक प्रचलन दिया। उनके अनुसार “हिंदू होना किसी पंथ की सीमा नहीं, बल्कि एक विचार, कर्म और आचार का स्वरूप है।”धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को उन्होंने पश्चिम की राजनीतिक उपज बताया और कहा कि भारत की परंपरा तो “सर्वधर्म समभाव” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” पर आधारित है। अंतिम सत्र में महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
तीसरे और अंतिम सत्र में नागरिकों ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे-हिंदुत्व की आधुनिक परिभाषा क्या हो? वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका कैसे बढ़ रही है? शिक्षा-संस्कृति के क्षेत्र में संघ की क्या दिशा होनी चाहिए? और युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद किस प्रकार समझाया जाए? सरकार्यवाह ने सभी प्रश्नों का शांत, तर्कपूर्ण और स्पष्ट उत्तर देते हुए संघ के दृष्टिकोण और समकालीन चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।


