भास्कर न्यूज | बलौदा बाजार नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर परिसर रविवार कोआध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ नजर आया। महासमाधि धारक परम पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित तथा आचार्य समय सागरजी महाराज की परंपरा का पालन करने वाले मुनि धर्म सागरजी महाराज और मुनि भाव सागरजी महाराज का 30 नवंबर को नगर में मंगल प्रवेश हुआ। उनके स्वागत में पूरे शहर में मांगलिक क्रियाएं की गईं। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह पाद प्रक्षालन कर पुण्य अर्जित किया और आहारचर्या विधिवत संपन्न हुई। मुनि संघ का पदबिहार श्री सम्मेद शिखर जी की ओर अग्रसर है, जो अकलतरा और जशपुर मार्ग से होते हुए आगे बढ़ रहा है। अकलतरा जैन समाज द्वारा मुनि संघ का गरिमापूर्ण स्वागत करते हुए श्रीफल अर्पित किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि भाव सागरजी महाराज ने ध्यान की महत्ता पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ध्यान अपने को मिटा देने और अपने अहंकार को छोड़ने की प्रक्रिया है। यह मन से अलग होकर आत्मा का साक्षात्कार करने का मार्ग है। उन्होंने बताया कि ध्यान से जीवन में सुख-शांति का संचार होता है, मन स्थिर होता है और ज्ञान की उपयोगिता बढ़ती है। उन्होंने कहा कि जब ध्यान के फूल खिलते हैं तो जीवन का बगीचा महक उठता है। आत्ममंदिर में ध्यान का दीपक जलने से अंतःकरण का ताला खुलता है और आत्मा में छिपी परमात्मा की आभा प्रकट हो उठती है। ध्यान सत्य का अंतरदर्शन और जीवन की समग्रता में प्रवेश का माध्यम है। इससे मस्तिष्क के संवेदनशील विभागों में सकारात्मक परिकंपनाएं विकसित होती हैं और मनुष्य की प्रज्ञा एवं प्रतिभा प्रखर हो जाती है। ध्यान को आत्मस्थ होने का सर्वोत्तम मार्ग बताते हुए मुनि भाव सागरजी महाराज ने कहा कि ध्यान वह चाबी है जो आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उत्कर्ष के द्वार खोलती है। उनके उपदेशों से श्रद्धालुओं में ध्यान साधना के प्रति नई प्रेरणा और उत्साह का संचार हुआ।


